PEN ( PRINT & ELECTRONIC NETWORK )

 पेन न्यूज पोर्टल की परिकल्पना हिमाचल के अनुभवी पत्रकारों के एक समूह द्वारा की गई। पत्रकारों के इस समूह ने अनुभव किया कि हिमाचल में भी पत्रकारों की पीड़ा को स्वर देने के लिए एक पोर्टल होना नितांत जरूरी है और जन्म हुआ पेन न्यूज का। इस परिकल्पना को मूर्त रूप देने में एक दशक से भी अधिक समय से पत्रकारिता के माध्यम से समाज सेवा में जुटे संजीव शर्मा ने महत्वपूर्ण किरदार अदा किया। पेन न्यूज़ पत्रकारों को समर्पित हिमाचल प्रदेश / उत्तराखंड का पहला वेब पोर्टल है। जितने कठिन हिमाचल / उत्तराखंड के रास्ते हैं उससे कई कठिन है यहां की पत्रकारिता इसी लिए उन कलम के सिपाहियों की आवाज को उठाने के लिए पेन न्यूज का आगाज किया गया है। हमारा मकसद मीडिया क्षेत्र में चलने वाली हलचल से आपको रू.ब.रू करवाना है।

मीडिया के लफंगे-परिंदे!

सनसनी के नाम पर सच्‍चाई से खिलवाड़ : इन दिनों न्यूज़ चैनलों पर असली के नाम पर नकली और मिलावट की ख़बरें खूब चल रहीं है. कहीं असली दूध के नाम पर नकली सिंथेटिक दूध मिल रहा है तो कहीं बड़ी ब्रांडेड कंपनियों की बोतल में नकली कोल्ड ड्रिंक और इन सब का भंडाफोड़ कर रहे है न्यूज़ चैनल. आपको पता चले कि तमाम न्यूज़ चैनल और उनके स्ट्रिंगर भी असली खबर के नाम पर नकली का धंधा कर रहे हैं तो आप के पैरों तले ज़मीन सरक जाएगी. आप सोचेंगे किस पर यकीन करें और किस पर ना करें. जी हां, ये सच्ची कहानी हम आपके लिए लाये हैं खास इलाहाबाद से. आप ने टीवी पर देखा होगा उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद की ख़बरें लखनऊ को भी पीछे छोड़ रही हैं. रोज़ किसी न किसी बड़े राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल पर इलाहाबाद की कोई न कोई खबर सनसनी पैदा कर रही है. अगर आप गौर फरमाए तो सोचेंगे की इलाहाबाद जहां किसी राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल का बंदा नियुक्त नहीं है, सब स्ट्रिंगर हैं, वहां से ऐसी ख़बरें... अब इन ख़बरों की सच्चाई भी जान लीजिये...मैं सिर्फ पिछले कुछ दिनों इन चैनलों पर दिखीं ख़बरों का जिक्र करने जा रहा हूं.

स्टोरी नंबर एक... इलाहाबाद के थरवई थाने में पड़ने वाले शीतलपुर गांव में 3 जुलाई को ज़मीन के विवाद में गांव के दबंगों ने, लल्ली देवी नाम की एक दलित महिला का वो घर गिरा दिया, जिसको लेकर विवाद था. इस दौरान दबंगों ने लल्ली देवी के परिवार वालों की पिटाई भी की. जब लल्ली देवी बीच में आईं तो उन्‍हें भी मारा-पीटा और घसीटा गया. लल्ली देवी ने बताया कि उसे घसीटने के दौरान उसके कपड़े अस्त-व्यस्त हो गए थे, लेकिन शाम को ये खबर एक न्यूज़ चैनल पर "राष्ट्रीय शर्म" के नाम से प्रसारित की गई. मुद्दा बनाया गया मायावती के राज में एक दलित महिला को दबंगों ने निर्वस्त्र कर पूरे गांव में घुमाया. उस चैनल पर चीरहरण का ग्राफिक्स भी बनाया गया. रात तक हालत ये हो गयी कि इस खबर से पुलिस अधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए. शहर के स्टार रिपोर्टर ने उनकी पतलून ढीली कर दी थी.

रात में आनन-फानन में डीआईजी महोदय ने प्रेस कांफ्रेंस कर सफाई दी. उन्‍होंने कहा कि ये बात सरासर झूठ है. खुद लल्ली देवी ने भी निर्वस्त्र घुमाये जाने का जिक्र किसी से नहीं किया, न तो चैनल के दर्जन से ज्यादा माइक के सामने न पुलिस के सामने. फिर ये खबर कैसे और कहां से आ गयी? हालांकि पुलिस ने बाकी घटना को स्वीकार किया. इस मामले कार्रवाई करने का आश्वासन भी दिया. हमारे पास भी उस महिला की रिकार्डेड बाइट है. हम बताते हैं आपको, एक-एक अक्षर उसी महिला की जुबान में कि उसने दर्जनों पत्रकारों के सामने क्या कहा..."साहब जब हमका घेर्राए के मारे लगेन, सब सर पे बटुर गया..सब सर पे चढ़ गया..पूरी एकदम जैसे घेर्राए लगेन..सारी धोती तो सब सर पे चढ़ गया".

जाहिर है जैसा लल्ली देवी ने खुद बताया, उनके साथ मार-पीट के दौरान उनके कपड़े अस्त-व्यस्त हुए थे, लेकिन... नंगा कर गाँव में घुमाना अलग और बेहद संगीन मामला है. खैर, फर्जीवाडा करने वाले चैनल की टीआरपी आसमान पर थी और उसके स्ट्रिंगर का दिमाग सातवें आसमान पर, लेकिन अगर सच माने तो राष्ट्रीय शर्म यहाँ किसके लिए है, सरकार के लिए या न्यूज़ चैनल के लिए. जिसने सारे समाज के सामने टीवी पर दलित महिला का चीरहरण किया. हम ये मानने को भी तैयार नहीं हैं कि ये केवल स्ट्रिंगर का दिमाग की उपज था. आखिर पीड़ित महिला की बाइट भी तो किसी भी सूरत में "राष्ट्रीय शर्म" की खबर को सपोर्ट नहीं कर रही थी..

स्टोरी नम्बर दो...17-18 अगस्त को जी न्यूज़ पर एक खबर धड़ल्ले से चल रही थी. इलाहाबाद में चाइना शराब का धंधा शबाब पर. हजारों की जान मुश्किल में. होमियोपैथी की दुकान पर बिक रही है "चाइना शराब." दवा की बिक्री का आलम ये है की इसने देशी और विदेशी शराब को भी पीछे छोड़ दिया है. उत्तर प्रदेश के आबकारी विभाग की नींद उड़ गयी है. सरकार ने विभाग से एक हफ्ते में जवाब मांगा है ..वगैरह-वगैरह. पर इसकी असली कहानी दुसरी थी. पूरा मामला दरअसल होमियोपैथी की एक दवा "टोन एंड प्लस" से जुड़ा हुआ है, जिसकी 200 एमएल की बोतल 35-40 रुपये में मिलती है. इस दवा में  जिसमे 35 से 40 प्रतिशत तक अल्कोहल की मात्रा होती है.

ये सच है कि इस तरह का मामला उत्तर प्रदेश के कुछ दूसरे जिलों में सामने आया था, लेकिन वो न तो इतना बड़ा मामला था और ना उसमें इलाहाबाद का कहीं नाम-पता था. खबर के दौरान दिखाई गयी तस्वीरें भी फर्जी थी. इन तस्‍वीरों में कुछ लोग देशी पौव्‍वा पी रहे थे...हालांकि होमियोपैथी की दवा की कुछ दुकानों के दृश्‍य असली थे. अब इन दुकानों के मालिक उस स्ट्रिंगर को तलाश कर रहे हैं, जिसने झूठ बोलकर उनकी दुकानों की तस्वीरें उतार ली थी. ये लोग कोर्ट जाने की तैयारी भी कर रहे हैं. इस खबर की सच्चाई आबकारी विभाग से पूछने पर पता चल सकती है. अधिकारियों ने इलाहाबाद में इस तरह के किसी भी मामले से इनकार कर दिया.

स्टोरी नंबर तीन...इलाहाबाद में हफ्ता भर पहले एक खबर ज्यादातर न्यूज़ चैनलों पर सुर्खियाँ बटोर रही थी... खबर थी इलाहाबाद में "हंटर वालों का खौफ." मामला इलाके के बहरिया क्षेत्र से जुड़ा था. छेड़खानी के झगड़े में गामा यादव नाम के एक शख्स की पिटाई दो मोटरसाइकिल सवारों ने कर दी. यह खबर एक हिंदी दैनिक ने छापी. फिर क्या था न्यूज़ चैनल वालों का दिमाग चलने लगा. स्ट्रिंगरों की एक टोली इलाके में पहुंच गई. उनके साथ था तांगा हांकने वाला एक हंटर और अपनी पत्नियों की लिपिस्टिक. भाइयों ने अखबार के स्थानीय सूत्र के माध्यम से एक दर्जन लोगो को इकट्ठा किया. इसके बाद शुरू हो गया ड्रामा. कुछ गांव वालों के शरीर पर लिपिस्टिक से हंटर के निशान बनाये गए. उनकी बाइट ली गयी.

उसके बाद क्या था, दूसरे दिन से न्यूज़ चैनलों पर हंटर वालों के खौफ दिखाई पड़ने लगा. इलाहाबाद के बाज़ार सूने पड़ गए. लोग रात को घर से निकलने में कतराने लगे. कुछ चैनलों ने पीड़ितों को लाइव किया. कुछ ने नाट्य रूपांतरण तक करा डाला. इस मामले को बहन जी की मानि‍टरिंग कमेटी की टीम ने संज्ञान ले लिया. फिर क्या था लखनऊ शासन से इलाहाबाद की अधिकारियों के फ़ोन घनघनाने लगे. एक बार फिर खाकी वालों की घिग्‍घी बंध गयी. आनन-फानन में रात को प्रेस कांफ्रेंस बुलाई गई. एसपी महोदय चिंतित थे. उन्होंने प्रेस कांफेंस में खुलकर कहा कि मामला पूरी तरह फर्जी है. उन्होंने हंटर की चोट खाए एक शख्स को मोबाइल से कॉल किया. मोबाइल को स्पीकर मोड पर लिया और पूछा- बताओ तुमको हंटर किसने मारा? सच बताओं और सच नहीं बोलोगे तो तुम्हारी चमड़ी खींच लूंगा. फ़ोन पर मौजूद शख्स घबरा गया उसने कहा- साहब कुछ चैनल वाले आये थे और रंग लगाकर हमारी फोटो खींचकर ले गए हम और कुछ नहीं जानते.

प्रेस कांफेंस के दौरान वो स्ट्रिंगर भी मौजूद थे, जिन्होंने इस कहानी का फर्जीवाडा किया था. उन्होंने तुरंत एक सब-इंस्पेक्टर का हवाला दिया कि उसने बाइट दी है. उसने कहा है कि वो मामले की जांच करेंगे और हंटर वालों से रक्षा के लिए कमेटी भी बनायेंगे. अब एसपी साहब ने उस सब-इंस्पेक्टर से स्पीकर ऑन कर मोबाइल मिलाया, जो रिटायर होने वाला था. सिपाही से भर्ती होकर उम्र के आखिरी पड़ाव पर वो बड़ी मुश्किल से सब-इंस्पेक्टर बना था, टीवी पर आने की उसकी दबी ख्‍वाहिश ने उसका बेड़ा गर्क कर दिया. एस.पी. साहब ने पूछा कि तुमने मीडिया को क्या बताया है....सब इंस्पेक्टर की जबान लड़खड़ाने लगी. उसने कहा साहब कुछ मीडिया वाले आये थे और हमसे जो बोलने को कहा हमने बोल दिया, बड़ी गलती हो गयी. खैर, मामला आया गया हो गया.

पहले तो एसपी साहब मीडियावालों पर कार्रवाई की बात कर रहे थे लेकिन कुछ दिन बाद ठंडे पड़ गए. एसपी साहब जानते हैं कि पुलिस सौ गलत काम रोज़ करती है और मीडिया से दुश्मनी अच्छी नहीं. पर हम इतना जरुर कहेंगे कि इन सब मामलों में केवल स्ट्रिंगर ही दोषी नहीं हैं. दोष उनके चैनल के न्यूज़ एडिटर और प्रोडूसर का भी है जो साफ़-साफ़ फर्जी दिखने वाली ख़बरों को भी बड़ी खबर बना देते हैं, कमबख्‍त टीआरपी के लिए. शायद यही सोचते होंगे कि ऐसी मीडिया ही देश में क्रांति लाएगी. एक ज़माना था जब टीवी चैनल वालों की ज़माने में बड़ी इज्जत थी, लेकिन आज इज्जत तो दूर की बात, वो गली-मोहल्ले और चौराहों पर बेभाव पिट रहे है. आप ऐसी तस्वीरें भी आप टीवी पर ही देख सकते हैं.


 

सौदा नहीं पटा तो टाइम्स ग्रुप ने चलाया अभियान!

कवर स्टोर मीडिया घराने का काला धंधा : 15 सितम्‍बर 2010 को टाइम्‍स ऑफ इंडिया 'कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स' को लेकर कौन-सी खबर छापेगा? यह अभी से कहना नामुमकिन है. लेकिन, अगर नौ माह पहले 'कॉमनवेल्‍थ आयोजन समिति' के साथ 'टाइम्‍स ग्रुप' की डील हो गई होती तो 15 सितम्‍बर को टाइम्‍स ग्रुप के समाचार पत्र, न्‍यूज चैनल व एफएम चैनल विशेष तौर पर बताते कि दिल्‍ली व दिल्‍ली वाले किस तरह कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स के लिए पूरी तरह तैयार हैं.

 

ये बताते कि वे न सिर्फ तैयार हैं, बल्कि दुनिया के सामने पहली बार सबसे बेहतरीन आयोजन को अंजाम देने जा रहे हैं. 15 सितंबर को टाइम्‍स ऑफ इंडिया, नवभारत टाइम्‍स, महाराष्‍ट्र टाइम्‍स, मुंबई मिरर, सांध्‍य टाइम्‍स दो से आठ पन्‍नों का विशेष परिशिष्‍ट छापते. इसके साथ इकनॉमिक्‍स टाइम्‍स में भी खास कवरेज रहता. दूसरी ओर टाइम्‍स ग्रुप के दोनों न्‍यूज चैनल कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स के आयोजन समिति के चेयरमैन सुरेश कलमाड़ी पर खास कार्यक्रम कर खेलों को सफल बनाने में जुटे हर वालंटियर के उत्‍साह दोगुना करने में जुटे होते.

अगस्‍त के पहले दो हफ्तों में जब 'टाइम्‍स ग्रुप' के अखबार और 'न्‍यूज चैनल' क्‍वींस बैटन के दौरान हुए घपलों की पोल पट्टी खोल रहे थे और सुरेश कलमाड़ी की फजीहत विदेश मंत्रालय से लेकर संसद के भीतर तक हो रही थी,  अगर 'टाइम्‍स ग्रुप'  की नौ महीने पहले कॉमनवेल्‍थ के आयोजन समिति के साथ डील हो गई होती तो इन सारी खबरों के बदले कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स को लेकर सुरेश कलमाड़ी की तैयारी की वाहवाही यही 'टाइम्‍स ग्रुप' कर रहा होता.

14 अगस्‍त को जब कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स में 50 दिन बचे थे और जिस दिन कॉमनवेल्‍थ की रुकी घड़ी अखबार से लेकर 'न्‍यूज चैनल' के पर्दे पर बार-बार दिखाई जा रही थी और दिल्‍ली को कॉमनवेल्‍थ के लिए सबसे नाकाबिल शहर बताया जा रहा था, अगर नौ महीने पहले वाली डील पक्‍की हो गई होती तो 14 अगस्‍त को 'टाइम्‍स  ग्रुप' इसी कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स को लेकर देश-दुनिया का उत्‍साह दोगुना करने के लिए इसमें शामिल होने वाले एथलिट्स को लेकर परिशिष्‍ट भी निकालता. साथ ही चैनल में कार्यक्रम भी करता.

डील हो गई होती तो दुनिया के टॉप मोस्ट एथलिटों के इंटरव्यू और उन पर केन्द्रित कार्यक्रम दिखाने और छापने का भी आइडिया था, जो कॉमनवेल्थ गेम्स में शामिल होने दिल्ली पहुंचने वाले हैं. यानी बीते डेढ़ महीने में कॉमनवेल्थ को लेकर जो भी खबर टाइम्स ग्रुप में आपने देखी या पढ़ी अगर कॉमनवेल्थ गेम्स का सहयोगी मीडिया पार्टनर 'टाइम्स ग्रुप' हो गया होता, तो यह सब देखने-सुनने को नहीं मिलता.

लेकिन मीडिया का मतलब तो 'टाइम्स ग्रुप' है नहीं. वह सबसे बड़ा ग्रुप है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता. फिर भी यह कैसे कहा जा सकता है कि कॉमनवेल्थ गेम्स के तमाम घपलों पर डील की कारपेट पड़ गई होती, अगर टाइम्स ग्रुप से डील हो गई होती. जाहिर है ऐसा होता नहीं. या कहें यह सोचना मुश्किल है. लेकिन मीडिया का चेहरा अपने आप में डील के लिए कैसे एक है और डील किस तरह 'पेड न्यूज' के आगे की सोच है... असल कहानी यही है. ठीक दस महीने पहले, कह सकते हैं कॉमनवेल्थ गेम्स शुरू होने के करीब एक साल पहले कॉमनवेल्थ गेम्स की आयोजन समिति ने तमाम मीडिया हाउसों को यह कहकर आमंत्रित किया था कि कॉमनवेल्थ गेम्स को सफल बनाना है. इसमें मीडिया की भागीदारी बेहद जरूरी है.

जाहिर है कॉमनवेल्थ गेम्स का मतलब अरबों का बजट है तो इसके प्रचार-प्रसार में भी करोड़ों का खर्चा होना ही था. तमाम मीडिया हाउसों में पहली तरंग इसी बात को लेकर उठी कि प्रचार का बजट अगर उनके हिस्से आए तो बात ही क्या है. इसका असर पहली बैठक में नजर आया, जिसमें मीडिया संपादकों से ज्यादा मीडिया हाउसों के लिए विज्ञापन जुगाड़ने वाले या फिर उन डायरेक्टरों की फौज दिखाई पड़ी जो हर हाल में कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए अपने-अपने मीडिया हाउसों को सुरेश कलमाडी यानी आयोजन समिति का पार्टनर बनने को बेचैन थे. जाहिर है मीडिया पार्टनर बनने का मतलब एकमुश्त करोड़ों की डील और उसके जरिए कॉमनवेल्थ से जुड़ने वाले प्रोडक्टों से कमाई.

इस कमाई के लिए ही हर राष्ट्रीय अखबार और न्यूज चैनलों ने अपने-अपने टेंडर डाले. लेकिन सुरेश कलमाडी प्रचार के इस सच को समझते हैं कि अंग्रेजी मीडिया से उनका काम चल सकता है, क्योंकि देश में पॉलिसी मेकर अंग्रेजी मीडिया को ही देखता है. इसलिए टेंडर आने के बाद सुरेश कलमाडी ने आयोजन समिति के एडीजी कम्युनिकेशन को जो पहला निर्देश दिया. हिन्दी मीडिया को खारिज कर अंग्रेजी मीडिया के टेंडरों को देखने का काम हो. लेकिन सुरेश कलमाडी ने यहां भी यूज-एंड-थ्रो की पॉलिसी अपनाई.

हालांकि जानकारी के मुताबिक, आयोजन समिति में प्रचार-प्रसार देखने वाले कम्युनिकेशन डिपार्टमेंट में इस बात को लेकर भी चर्चा हुई कि एक को पार्टनर बना कर दूसरे को खारिज करना कहां तक सही होगा. वह भी तब जब मीडिया अपने आप में गला काट खेल टीआरपी से लेकर विज्ञापन पाने तक के लिए कर रही है. पर सुरेश कलमाडी का कहना था, 'लेकिन टेंडर सभी को नहीं दिया जाता.'  कलमाडी की इस थ्योरी के तहत चर्चा जो भी हुई हो, लेकिन अखबार के मीडिया हाउसों में 'टाइम्स ऑफ इंडिया' को खारिज कर 'हिन्दुस्तान टाइम्स' को चुना गया. अंग्रेजी न्यूज चैनलों में एनडीटीवी को खारिज कर 'सीएनएन-आईबीएन' को चुना गया. प्रचार-प्रसार के लिए करोड़ों की इस डील में टाइम्स ऑफ इंडिया का 12 करोड़ 19 लाख रुपए का टेंडर खारिज हो गया. हिन्दुस्तान टाइम्स का करीब पौने दस करोड़ का टेंडर मंजूर हो गया. इसी तर्ज पर एनडीटीवी और सीएनएन-आईबीएन का भी खेल हुआ.

यहां सवाल उठाया जा सकता है कि जिन्हें सुरेश कलमाडी ने खारिज किया वह कॉमनवेल्थ गेम्स के पीछे पड़ गए. वे हर घपले को खोद-खोदकर निकालते चले गए. लेकिन घपलों में डूबी कॉमनवेल्थ लूट जब सामने आई उन मीडिया हाउसों की भी मजबूरी बन गई कि वह अपनी संपादकीय छवि के साथ कैसे समझौता करें. इसलिए जो तेवर और तल्खी 'टाइम्स ग्रुप' ने दिखाई वह हिन्दुस्तान ने नहीं दिखाई. हिन्दुस्तान टाइम्स ने सिर्फ सूचना के तौर पर कॉमनवेल्थ गेम्स के घपलों को पकड़ा. कुछ यही स्थिति एनडीटीवी और सीएनएन-आईबीएन की रही. एनडीटीवी की रिपोर्ट कॉमनवेल्थ गेम्स के घपलों को सूंड से पकड़ रही थी, तो सीएनएन-आईबीएन ने घपलों को पूंछ से पकड़ा. लेकिन 'टाइम्स ग्रुप' के पास चूंकि न्यूज चैनल भी हैं और उसने 'हर दिन हर घंटे' जब अपने समूह की खबरों के इनपुट पर सुरेश कलमाडी को घेरना शुरू किया तो उसके सामने कोई टिका नहीं.

यहां तक की टाइम्स की रिपोर्ट पर जदयू के सांसद शरद यादव ने लोकसभा में सुरेश कलमाडी को मोटी चमड़ी वाला तक कह दिया. और टाइम्स ग्रुप के उन डायरेक्टरों के लिए भी यह गर्व की बात हुई कि संपादकीय सोच और रिपोर्टरों की रिपोर्ट ने उस कॉमनवेल्थ गेम्स की आयोजन समिति या उसके चेयरमैन सुरेश कलमाडी को पूरी तरह नंगा कर दिया, जिसने उनके टेंडर को खारिज कर दिया था. यानी संपादकीय समझ अगर तेवर वाली और सच को उजागर करने वाली हो तो फिर विज्ञापन मांगने वालों की मूंछ कोई नीचे नहीं कर सकता.

लेकिन मीडिया के भीतर विज्ञापन के नाम पर कैसे संपादकीय सोच को गिरवी रखा जाता है, यह भी संयोग से 'टाइम्स ग्रुप' के उस टेंडर से ही उभरता है, जिसमें 12 करोड़ 19 लाख रुपए के बदले करीब 28 पेज विज्ञापन के और बिना विज्ञापन 16 पेज खबरों को देने की बात कही गई। अगर टाइम्स ग्रुप के साथ कॉमनवेल्थ की डील हो गई होती तो 26 जनवरी 2010 से यानी कॉमनवेल्थ गेम्स शुरू होने के 250 दिन पहले से प्रचार-प्रसार शुरू होता. इसमें खासतौर से पांच पड़ाव ऐसे रखे गए थे जिस दिन टाइम्स ग्रुप कॉमनवेल्थ के लिए समूचे देश में धूम मचा देता. शुरुआत 26 जनवरी यानी गणतंत्र दिवस से होती. फिर 8 मार्च यानी कॉमनवेल्थ दिवस, 25 जून यानी क्विन्स बैटन के भारत की सीमा में प्रवेश का दिन, फिर 14 अगस्त यानी कॉमनवेल्थ से ठीक 50 दिन पहले का जश्न और पांचवा 15 सितंबर यानी सिर्फ 18 दिन पहले कॉमनवेल्थ के लिए तैयार दिल्ली.

इन दिनों 'टाइम्स ग्रुप' अपने सभी अखबारो में खबरो के पन्नों पर कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए बिना विज्ञापन के दस पेज में ऐसी-ऐसी रिपोर्ट छापता, जिससे कॉमनवेल्थ गेम्स को लेकर ऐसी विश्वसनीयता देश में पैदा होती कि इससे सफल आयोजन और कुछ हो ही नहीं सकता है. लेकिन खबरों के पन्नों का बिकना यहीं नहीं रुकता, बल्कि टाइम्स ग्रुप छह पन्नें की रिपोर्ट उन 15 से ज्यादा स्टेडियम की तैयारी पर छापता. वह यह कि किस तरह शानदार आयोजन के लिए शानदार स्टेडियम तैयार हैं.

यानी अभी जो स्टेडियम की बदहाली की खबरें छप रही हैं और जिस तरह हर स्टेडियम में सीपीडब्ल्यूडी, एनडीएमसी, डीडीए, एमसीडी समेत तमाम संस्थान के घपले की परतें छिपी हैं. उनके बदले इन स्टेडियम को पूरा करने में लगे हुनर और इसमें इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय स्तर के उत्पाद का जिक्र होता. फिर स्टेडियम जब आयोजन समिति को सौंपा जाता तो स्टेडियम सौंपने के शानदार किस्से बतौर रिपोर्ट अखबारो के पन्नों पर छपते. यानी यह नहीं रहता कि जिस जवाहरलाल स्टेडियम के पुनर्सुंदरीकरण में साढ़े छह सौ करोड़ लग गए, उस रकम में तीन नए स्टेडियम बन जाते. और प्रत्येक स्टेडियम में बैठने से लेकर पार्किंग तक और सुविधाओं की भरमार स्टेडियम के हर कोने की तस्वीरें छपती. उसकी जानकारी दी जाती.

खास बात यह भी है कि संपादकीय समझ या खबरों का पन्ना विज्ञापन के लिए दांव पर लगाने से समाचार पत्र की छवि धूमिल होती है. इस सोच से इतर विज्ञापन के लिए दिए गए टेंडर में बकायदा यह लिख कर संकेत दिया गया कि विज्ञापन पार्टनर बनाने का मतलब हमारा संपादकीय विभाग भी आपके वाह-वाह में जुट जाएगा. ऐसा नहीं है कि यह समझ सिर्फ टाइम्स ग्रुप की है, बल्कि 'हिन्दुस्तान टाइम्स' ने भी कॉमनवेल्थ गेम्स में मीडिया पार्टनर बनने के लिए खबरों में कॉमनवेल्थ के वाह-वाह करने के संकेत दिए. संपादक को कितना अपाहिज एक झटके में बना दिया गया, यह इससे भी समझा जा सकता है कि घपलों या घोटालों के उभरने से पहले नवंबर 2009 यानी नौ महीने पहले ही कॉमनवेल्थ आयोजन समिति को बाकायदा लिखकर यह भरोसा दिला गया कि कॉमनवेल्थ खेल को लेकर सकारात्मक और सही भूमिका संपादकीय विभाग भी अपनाएगा. साथ ही सभी आम जनता की सोच को भी कॉमनवेल्थ गेम्स से जोड़ने में लगेंगे.

कह सकते हैं कि अभी जिस तरह टाइम्स ग्रुप ने समूचे देश को कॉमनवेल्थ लूट से परिचित कराते हुए, कांग्रेस तक को यह कहने पर मजबूर कर दिया कि सुरेश कलमाडी बतौर कांग्रेसी कॉमनवेल्थ नहीं संभाल रहे हैं. सोनिया गांधी को कहना पड़ा कि 15 अक्टूबर के बाद यानी कॉमनवेल्थ गेम्स समाप्त होने के बाद किसी भी घोटालेबाज को बख्शा नहीं जाएगा. फिर पीएमओ की तरफ से बयान आया कि अब सबकुछ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की निगरानी में होगा. अगर यह सारी खबरें संपादकीय विभाग की मेहनत से नहीं आती और टाइम्स के साथ नवंबर 2009 में ही डील हो गई होती तो 10 नवबंर 2009 को सुरेश कलमाडी के नाम 'टाइम्स आफ इंडिया' के डायरेक्टर सी.आर. श्रीनिवासन का पहला पत्र देखना जरूरी होगा.

इसमें उन्होने 'टाइम्स ग्रुप' को कॉमनवेल्थ आयोजन समिति से मीडिया पार्टनर बनाने की गुहार लगाते हुए अपने स्तर पर बिना कॉमनवेल्थ बजट के लंबी चौड़ी फेरहिस्त के आयोजन की जिम्मेदारी लेते हुए लिखा कि इससे कॉमनवेल्थ गेम्स को लेकर समूचे देश में चार-चांद लग जाएंगे. मसलन डील हो गई होती तो टाइम्स ग्रुप देश भर में पहले से ही कॉमनवेल्थ क्विज से लेकर सेमिनार तक आयोजित करता. इसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर के वक्ता शिरकत करते. देश के हर बड़े और प्रमुख शहर में 'दिल्ली चलो' के नाम से मैराथन होता. काफी टेबल बुक भी निकलती. देश का ऐसा कोई इलाका न छुटता, जहां टाइम्स ग्रुप के पांच अखबारों की पहुंच नहीं है. इस प्रकार वहां कॉमनवेल्थ पहले ही पहुंच जाता.

अब सवाल है कि क्या सुरेश कलमाडी को 'टाइम्स ग्रुप' के साथ समझौता न करना महंगा पड़ा. या फिर अगर वह टाइम्स ग्रुप के साथ समझौता करते तो कोई दूसरा ग्रुप जिसके साथ समझौता न करते वह उनके पीछे पिल पड़ता. ऐसे में यदि कलमाडी ही समझदार होते तो शुरू से ही हर मीडिया हाउस को मैनेज करते चलते, जिससे कॉमनवेल्थ लूट की पोटली कम से कम इस रूप में तो नहीं खुलती. हो कुछ भी सकता है. लेकिन इस खेल ने पहली बार यह खुला खेल जरूर सामने ला दिया कि 'पेड न्यूज' या उसके आगे का विस्तार अगर खबरों को ही मुनाफे के लिए विज्ञापन डील के जरिए खत्म करना है तो फिर विश्वसनीयता के साथ किसी मीडिया समूह के होने का मतलब महज विज्ञापन नहीं है, बल्कि इसके लिए संपादक और रिपोर्टर चाहिए. क्योंकि यह न होता तो कॉमनवेल्थ लूट का खेल बाहर भी न आ पाता. साथ ही टाइम्स की छवि भी बची न रहती और चौथा खम्भा भी उस लोकतंत्र की रक्षा नहीं कर पाता, जो लोकतंत्र वाकई खतरे में है.


टीओआई की खीझ

-राम बहादुर राय-

प्रधान संपादक, प्रथम प्रवक्ता

'टाइम्स ऑफ इंडिया' खोजी खबरों के लिए नहीं जाना जाता। उसकी छवि सरकार के मुखपत्र की रही है। गत 31 जुलाई को टाइम्स ऑफ इंडिया के पाठकों को नया अनुभव हुआ। उन्हें महसूस हुआ कि अपना अखबार नए अवतार में है। उसने भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान छेड़ दिया है। 'टाइम्स ऑफ इंडिया' जैसा बड़ा अखबार जब खेल-कूद के एक अंतरराष्ट्रीय आयोजन की तमाम गड़बड़ियों को उजागर करने पर उतर आया तो लोगों को चारो तरफ गड़बड़ ही नजर आने लगा। उन्हें क्या पता था कि यह वह खीझ है जो अखबार में इसलिए प्रकट हो रही है, क्योंकि सौदा पटा नहीं।

इसका दूसरा पहलू भी देखे बिना बात साफ नहीं होगी। कॉमनवेल्थ गेम्स की आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाडी हैं। वे कांग्रेस के नेता हैं। पार्टी में उनका महत्वपूर्ण स्थान है। वे साफ-सुथरी छवि के लिए नहीं जाने जाते हैं। भ्रष्टाचार की खबर उन पर आसानी से चिपकाई जा सकती है।

क्या किसी अखबार को सौदा न पटने पर भ्रष्टाचार के अभियान से रोका जा सकता है? यह तो नहीं हो सकता। लेकिन अखबार को अपने पाठकों को क्या यह सूचित नहीं करना चाहिए कि उसकी ओर से कॉमनवेल्थ गेम्स के आयोजन में प्रचार-प्रसार और आयोजन को सफल बनाने के लिए एक प्रस्ताव दिया गया था जो नामंजूर हो गया। यह सूचना दे देने से उसके अभियान में वह बल नहीं रहता जो अखबार में दिख रहा है।

उदाहरण के लिए 31 जुलाई का अखबार सामने रख सकते हैं। उस दिन 'टाइम्स ऑफ इंडिया' ने पहले पेज पर 'खास खबर' दी। जिसका शीर्षक यह बताता था कि खेल के कर्ताधर्ता लालच के वश देश के सम्मान से खिलवाड़ कर रहे हैं। उसमें केंद्रीय सतर्कता आयोग और सीबीआई के हवाले से सभी सोलह प्रोजेक्ट में हुई धांधली की खबर थी। लंदन से 'टाइम्स नाऊ' की नाविका कुमार की खबर साथ में छपी थी कि अक्टूबर 2009 में जब क्विंस बैटन रिले का समारोह हुआ तो उसका इंतजाम जिस कंपनी को दिया गया वह एक फर्जीवाड़ा था। उसके लिए कोई टेंडर आमंत्रित नहीं किया गया। उस सामारोह में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल भी मौजूद थी। जिस ए.एम. फिल्म्स को प्रबंध करना था उसे एक करोड़ अड़सठ लाख रुपए का ठेका दिया गया था।

अगले दिन पहली अगस्त को टाइम्स ऑफ इंडिया के पहले पेज पर जो खबरें छपीं, उनमें खासतौर पर भारतीय उच्चायुक्त के हवाले से कहा गया था कि सुरेश कलमाड़ी का दावा सही नहीं है। सुरेश कलमाडी ने दावा किया था कि ए.एम. फिल्म्स को ठेका देने में किसी तरह की गड़बड़ी नहीं की गई।

एक तरफ 'टाइम्स ऑफ इंडिया' अभियान चला रहा था, क्योंकि उसे मनचाहा ठेका नहीं मिला। लेकिन 'हिंदुस्तान टाइम्स' ने एक अगस्त को 'टाइम्स ऑफ इंडिया' के जवाब में सुरेश कलमाडी का इंटरव्यू छापा। उस लंबे इंटरव्यू में आरोपों पर सफाई है। 'हिंदुस्तान टाइम्स' के मनीष तिवारी की रिपोर्ट भी बताती है कि केंद्रीय सतर्कता आयोग भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कर रहा है।

आरोप तो आरोप ही है। उसे फैसला के रूप में तभी पेश किया जाता है, जब वह किसी खास मकसद से किया जा रहा हो। अगस्त महीने में करीब रोज टाइम्स ऑफ इंडिया ने तैयारी में किए जा रहे भ्रष्टाचार और घटिया तैयारी पर खबरें छापता रहा। 'टाइम्स ऑफ इंडिया' अपने पाठक को 54 पेज का अखबार देता है। वह दो हिस्से में होता है। पहले हिस्से में 32 पेज रहता है। इन 32 पेजों में औसतन छह पेज पर अखबार ने खेल की तैयारी में गड़बड़ी और भ्रष्टाचार को जगह दी।


 

खबर की कीमत और पत्रकारिता का स्‍याह पन्‍ना

तांत्रिकएक पत्रकार का दर्द : इसके लिये वो महिला को नग्न करता था : बदमाश मुझ पर भूखे भेडि़यों की तरह टूट पड़े : इस बार मुझसे इस्तीफा ले लिया गया : मीडिया जब भी अपना मुंह खोलता है या अपनी कलम से बोलता है तो अपने लिए नहीं बल्कि इस गूंगे-बहरे समाज के लिए. एक मीडियाकर्मी के लिए ख़बर की चाहत जुनून के किस हद तक होती है, इस सवाल का जवाब पत्रकार बंधु अच्छी तरह जानते हैं. समाज का दर्द हम देख नहीं सकते और अपने दर्द में कभी उफ तक करना हमें मंजूर नहीं होता. कुछ दर्द ऐसा भी होता है जो बदलते समय के साथ और गहरा होता जाता है. और कई बार यही दर्द जेहन से निकल कर कागज के पन्‍नों पर उतर आता है. और फिर पन्‍ना कभी कभी बहुत सीख दे जाता है. मैंने भी इन पन्‍नों से बहुत कुछ सीखा है. इन्‍हीं यादों का झरोखा आज मैं खोलने को मजबूर हुआ हूं.
ये बात कुछ साल पहले की है. मैं उस समय एक टीवी न्यूज़ एजेंसी में काम कर रहा था. मेरे लिये ये सौभाग्य की बात थी पूरे जिले में मै अकेला टीवी पत्रकार था, पर परेशान कर देने वाली बात ये थी, काफी हाथ-पांव मारने के बाद भी मेरे हाथ महीने में महज पांच-छह ख़बरे ही लग पाती थी। खबरों के लिए कई बार तो सैकडों किलोमीटर का सफर भी तय करना पडता था. लेकिन न कभी रास्ते छोटे हुए और ना ही मेरी हिम्मत कम हुई. ख़बर खोजने की चाहत में मैं हमेशा अपने कान और आंख खुली रखता, एक बार अचानक मेरे हाथ एक ऐसा कागज लगा जिसमे लिखा था हर समस्या का समाधान है हमारे पास, साथ ही ये भी कि वो तांत्रिक निःसंतान को मनचाहा बच्चा भी दे सकता है.
मैंने ये सारी जानकारी अपने न्यूज़ डेस्क तक पहुंचाई मुझे कहा गया ख़बर बना कर भेजो.मैंने तुरंत जाल बिछाया क्योंकि ये ख़बर मेरे लिये चुनौती भरी थी, एक जोड़े को मैने उस तांत्रिक के पास भेजा. उन लोगों ने संतान ना होने की बात तांत्रिक को बताई. तांत्रिक ने कहा बिल्‍कुल बच्चा हो जायेगा, बस रोज मेरे पास आना होग, क्‍योंकि थोड़ा इलाज करना पड़ेगा. एक बार मैं खुद भी उस तांत्रिक बाबा के पास पहुंचा क्योंकि मैं मामले का जायजा खुद लेना चाहता था. इस बार भी उसने वही बात कही. तांत्रिक के पास मेरे अलावा और कई महिलाएं भी आई हुई थी, जिनके साथ बाबा पर्दे के अन्दर क्या कुछ करता था, ये कहना यहां पर मेरे लिये आसान नहीं है.
दरअसल ये बाबा सभी महिलाओं को बोलता था उनके अन्दर कोई आत्मा घुस गयी है, जिसे वो निकाल सकता है. इसके लिये वो महिला को नग्न करता था, आगे क्या होता होगा ये समझने के लिये दिमाग पर ज्यादा जोर डालने की जरूरत नहीं है. मैंने ये बात भी अपने न्यूज़ डेस्क को बता दी अब बारी अपने मिशन को अंजाम तक पहुंचाने की थी. इस बार मै एक लड़की के साथ उस तांत्रिक के पास पहुंचा ही था कि वहां पहले से मौजूद कुछ बदमाश मुझ पर भूखे भेडि़यों की तरह टूट पड़े. दस लोगों के बीच में मैं अकेला था. जहां जहां उनका दिल किया वहां वहां वो अपनी ताकत की अजमाइश किए. मैं भी अपने सामर्थ्‍य के हिसाब से मुकाबला करता रहा.
किसी तरह बचकर मैंने वहां से डीएसपी को फोन किया, क्योंकि आगे उन सब का मुकाबला कर पाना संभव नहीं था, फिर एक पत्रकार होने के नाते इस तरह मारपीट करना मेरी नज़रों में न कल सही था और ना ही आज है. इस दौरान अपने बचाव में मैं जो कुछ मुझ से हो सका वो सब किया.जख्मी हालत में मैं तुरंत थाने पहुंचा मुझ पर हमला करने वाले भी भाग चुके थे. अभी थाने के अन्दर बैठे मुझे चंद मिनट भी नहीं हुये थे कि अचानक मोबाइल की घंटी बज उठी. ये कॉल मेरे एजेंसी के न्यूज़ डेस्क, नोयडा से थी. बात करने वाले वो अधिकारी थे जो कभी हमें ख़बरों के लिए जूझना सिखाते थे. महोदय ने मुझसे यह नहीं पूछा कि हालत कैसी है, क्या हुआ तुम्हारे साथ, बल्कि  सीधा फरमान सुनाओ दिया गया कि चुपचाप नोएडा पहुंचो.
पुलिस मुझे जख्मी हालत में अस्पताल ले गयी. वहां मेरा मेडिकल कराया गया. तभी वहां के डॉक्टर को पता चला कि मै पत्रकार हूं तो उन्‍होंने धीरे से कहा भाई साहब एक टीवी पत्रकार है संजीव शर्मा, उनकी ख़बरें बड़ी अच्छी होती हैं, मैं उन्‍हें जानता तो नहीं परंतु वो आपकी मदद कर सकते हैं. ये सुनने के बाद मैं रोने लगा. मैंने डॉक्‍टर को बताया कि मैं ही संजीव शर्मा हूं. फर्क सिर्फ इतना है कि खबर बनाने वाला आज खुद खबर बन गया है. डॉक्टर साहब ने कहा आप मेरे बेटे जैसे हो इसलिए एक सलाह देता हूँ, इस समाज की बुराइयों से लड़ना बड़ा कठिन है. ये सब आगे भी होता रहेगा लेकिन कभी हार मत मानना. एक बार पेज थ्री फिल्म जरूर देखना, आपको बहुत कुछ सीखने को मिलेगा. मैंने डॉक्टर को धन्‍यवाद कहा और बाहर निकला. डॉक्‍टर साहब की सीख आज भी मेरे अंदर जिंदा है और जिंदा रहेगी. एक पल मुझे लगा शहर की मीडिया और मीडियाकर्मी मेरा साथ देंगे. लेकिन यहां मैं गलत था, कोई मेरे साथ खड़ा नहीं हुआ. जिनसे मुझे सबसे ज्यादा उम्मीद थी उन्‍होंने ही सबसे पहले मेरा साथ इस मुश्किल घड़ी में छोड़ दिया. लेकिन मैंने हार नहीं मानी तांत्रिक और तांत्रिक के गुंड़ों के खिलाफ थाने में मामला दर्ज करवा दिया. हां, लेकिन एक पत्रकार होने की हैसियत से नहीं बल्कि एक आम नागरिक की हैसियत से.
अगले रोज मैं नोएडा रवाना हो गया. न्यूज़ एजेंसी ने मेरे इस बहादुरी के लिए पुरस्‍कार पहले से ही तैयार रखा हुआ था. मुझसे कहा गया आप कुछ समय के लिये रिपोर्टिंग नहीं करेंगे. मुझे ये समझ में नहीं आया आखिर कंपनी ने ये फैसला क्‍यों लिया है. फिर पता चला कि मुझ पर आरोप लगाया गया है कि मैंने तांत्रिक से दस हजार रूपये मांगे थे. मैंने न्‍यूज एजेंसी ज्‍वाइन करने के बाद प्रॉपटी खरीदी. इन आरोपो का जवाब मैंने कम्पनी को नहीं दिया. कारण साफ है जब उनके नज़रों में हम बेईमान हैं तो इमानदारी का सबूत देने की जरूरत क्या है. हां, मैंने पांच बिस्वा जमीन खरीदी, लेकिन ये पैसे मेरे उस पिता के थे, जो आर्मी में लम्बे समय से गुमशुदा है. ये पैसा मेरी माता जी को आसाम राईफल्स ने दिया था. और ये जमीन सिर्फ एक लाख चालीस हजार रूपये की थी,  न की करोड़ों की. क्या बीस साल की नौकरी में मेरे पिता ने इतने पैसे भी नहीं कमाये होंगे कि वो अपने बच्चो के लिए पांच बिस्‍वा जमीन खरीद सकें.
मैंने अपने बेगुनाही का जवाब नहीं दिया, लेकिन असलियत सामने आने के बाद खुद तांत्रिक ने पुलिस में लिखित बयान दिया कि गलती मेरी है. मुझे माफ कर दिया जाये, मैं शहर छोड कर चला जाउंगा. मेरा मकसद ही था उस तांत्रिक को शहर से बाहर करना ताकि अंधविश्‍वास में अंधी होकर फिर कोई महिला उस हैवान के हवस की शिकार न बनें. ये अलग बात है कि इस कामयाबी के बदले मेरी नौकरी और इज्जत दोनों दांव पर लग गयी. मेरी इमानदारी के दस्तावेज थाने में आज भी मौजूद है.
इधर, नोयडा से बहादुरी का खिताब लेकर मैं अपने घर वापस पहुंच चुका था. फिर कम्पनी से फोन आया, मुझसे एक बार फिर नोयडा में हाजिरी दर्ज करवाने के लिये कहा गया. इस बार मुझसे इस्तीफा ले लिया गया और कहा गया आपके खिलाफ काफी शिकायतें हैं. मेरे खिलाफ शहर के ही एक नेता ने कम्पलेंट की थी, जिसके साइबर कैफे में बीएफ चलती थी. उसके खिलाफ हुई जांच की सीआईडी की टीम में मैं भी शामिल था. वर्तमान में ये मामला न्यायालय में विचाराधीन है. कम्पनी ने मुझे नौकरी से निकाल दिया. मैं कई महीने बेरोजगार रहा. लेकिन हर काली रात के बाद जिस तरह नई सुबह होती है, उसी तरह मेरी जिंन्दगी में उजाला आया. मुझे दिल्ली के एक उभरते एनसीआर न्यूज चैनल में नौकरी मिल गयी. इस चैनल में भी मेरे खिलाफ काफी कंम्पलेंट गयी लेकिन मुझे चैनल की तरफ से कभी कुछ नहीं बोला गया, क्योंकि उन्हें मुझ पर और मेरे इमान पर भरोसा था.
मेरा उस न्यूज़ एजेंसी से आज सिर्फ चंद सवाल हैं-
1. क्या एक मिशन में फेल होने का मतलब नौकरी से हाथ धौना होता है ? 
2. स्कूल में जाने वाला बच्चा भी फेल हो जाता है, इसका मतलब क्या वो गद्दार है ?
3. इंडिया क्रिकेट टीम भी हमेशा नहीं जीतती, इस हार को मैच फिक्सिंग कहा जाए ? 
4. किसी की चंद झूठी लाइनें क्या हमारे कैरियर को खत्म कर सकती हैं?
5. दो साल का रिश्ता चैबीस घंटे में कैसे टूट सकता है ?
6. विश्वास नहीं था तो अपना पत्रकार क्यो बना दिया ?
7. क्या हम पत्रकार आप के लिए चवीइंगम हैं, चूसों और थूक डालो ?
एक रिपोर्टर से न्यूज़ रूम के डेस्क इंचार्ज और रिपोर्टर से एसआईटी हेड का रास्ता आसान नहीं होता. मैंने ये रास्ता तय किया और अपने आपको साबित भी किया. लेकिन अपने दस साल के छोटे से अनुभव में बहुत कुछ सीखा, जहां विश्वास है वहां सबकुछ है, जहां विश्वास नहीं वहां कुछ नही. अगर मैं तांत्रिक वाले मिशन में कामयाब नहीं हुआ तो इसके पीछे सबसे बड़ा कारण ये था कि मैंने ये जानकारी उस इंसान के साथ शेयर की जिन्‍हें बहुत कुछ मानता था. लेकिन वो मेरी बात को रोटी की तरह पचा नहीं सके और उन्होंने ये जानकारी तांत्रिक को दे दी. खैर हर मोड़ हर दिन हर लम्हां हमें कुछ सीखाता है और हमे सीखना भी चाहिए इसी का नाम है जिन्दगी लाइव.

आपकी राय

मीडिया जब भी अपना मुह खोलता है या अपनी कलम से बोलता है तो सिर्फ दुनिया के लिए ,खुद वो भले ही तकलीफ हो लेकिन अपने मुह से वो उफ़ तक नहीं बोलता कई बार यह दर्द जहन से बहार आ जाता है और कभी कभी तो कलम मैं भी उतर आता है ... और फिर न जाने बहुत कुछ लिख जाता है ,, मैं अपने दर्द को बयाँ किया इस दर्द को मीडिया के कुछ साथियो ने अपने ब्लॉग , वेबसाइट मैं खास जगह दी पेश है मीडिया की एक वेबसाइट पर मेरा लेख और मंथन करने वाले पत्रकारों के कमेंट्स और सुझाव 

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Thursday, February 26, 2009
उस पत्रकार की वेदना को पढ़ मेरी आँखे नम हो गई 


एक मीडिया वेबसाइट पर एक पत्रकार संजीव शर्मा की आपबीती पढ़ी...सच में संजीव के दर्द को पढ़ कर मेरी आँखे नम हो गयी .संजीव ने लिखा है की एक स्टिंग ओपरेशन को अंजाम देने का ,उन्हें जिंदगी भर मलाल रहेगा ।सच ही तो है, एक पत्रकार जब किसी को इन्साफ नहीं दिला पता है ,तो वो अपने आप को जिंदगी भर कोसता रहता है ॥मेरी नज़र में यदि संजीव जी जिस मकसद से स्टिंग ओपरेशन करने गए थे, यदि उसी रूप में उन्हें स्टोरी मिल जाती तो, वो एक साधारण सी स्टोरी या स्टिंग ओपरेशन बन कर रह जाती ।लेकिन जिस सच से संजीव जी का सामना हुआ ,वो सच तो दिल को हिला देनेवाला है ॥एक महिला जो प्रसव पीडा से गुजर रही हो और उसके बाद भी अपना शरीर बेचने के लिए तैयार हो...सुन कर कलेजा कॉप जाता है॥आखिर वो महिला अपने प्रति इतनी निर्मम कैसे हो सकती है ।क्या उसे जिंदगी में इतने जख्म मिले है की, उसे अब किसी चीज़ की परवाह नहीं .जब पूरी कहानी पढ़ी तो लगा की दोषी कौन है ,वे लोग जिन्होंने उस लाचार महिला का फायदा उठाया या फिर हम पत्रकार जो उसे इन्साफ नहीं दिला सके ।मै यहाँ संजीव शर्मा द्वारा मीडिया के वेबसाइट भड़ास ४ मीडिया पर लिखे गए उनकी लाचारी को भड़ास ४ मीडिया का क्रेडिट देते हुए कॉपी पेस्ट कर रहा हु, ताकि आप भी इस सच को पढ़ सके । 


पेश है संजीव शर्मा की आपबीती  


मैं उस समय एक न्यूज चैनल में काम करता था। मेरी सबसे ज्यादा दिलचस्पी खोजी पत्रकारिता में थी। मुझे जानकारी मिली थी कि हिमाचल प्रदेश के एक जिला में सिर्फ 10 रुपए में जिस्म बिक रहा है। सुन के विश्वास होना आसान नहीं था लेकिन न जाने क्यों मैं इस सनसनीखेज खबर को अपने कैमरे में कैद करने के लिए बेचैन हो गया। मैंने सबसे पहले अपने चैनल को इसकी सूचना दी। मुझे पहले मना कर दिया गया क्योंकि स्टिंग ऑपरेशन चैनल दिखाना ही नहीं चाहता था।
मैंने अपने समाचार प्रमुख से भी बात की लेकिन उन्होंने भी रोक दिया। काफी मनाने के बाद मुझे स्टिंग करने के लिए कह दिया गया। मैं खुश था क्योंकि यह मौका अपने आपको साबित करने का था। मैं कैमरा पर्सन को लेकर उस इलाके में पहुंच गया। वो एरिया काफी खतरनाक था। हमारी एक गलती जान पर भारी पड़ सकती थी लेकिन न जाने क्यों कदम पीछे खीचने को मन नहीं कर रहा था। 100 किलोमीटर का लंबा सफर तय करके मैं वहां पहुंच गया था जहां मेरी मंजिल थी। हम वहां एक सरकारी अतिथि गृह में रुके। हमने अपने मिशन के बारे में किसी को कुछ नहीं बताया। अतिथि गृह के चौकीदार से मैंने पूछा कि क्या हमें एक रात के लिए कोई लड़की यहां मिल सकती है। चौकीदार ने उपर-नीचे घूरा और कहा कि मुझे आप लोग मीडिया वाले लगते हैं। कहीं कोई गड़बड़ तो नहीं होगी। चौकीदार को हमने यकीन दिला दिया कि हम मीडिया वाले नहीं है। चौकीदार ने बताया कि यहां एक महिला है जिसके साथ आप 10 रुपये में ही सेक्स कर सकते हैं। लेकिन उसके लिए पहले आपको मेरी जेब गर्म करनी होगी। मैंने तुरंत उसकी जेब में 100 रुपए दे दिए। दो-तीन दिन हम होटल में ही रुके रहे। एक दिन सुबह-सुबह चौकीदार हमारे कमरे में आया और कहा कि वो महिला बाहर खड़ी है, जिसकी आपको जरूरत है। मैंने कहा हमे पहले दूर से दिखाओ। मैंने दूर से जब उस महिला को देखा तो आंखें चकरा गई। उसकी उम्र करीब 30 साल थी और गजब की सुंदर थी। वह महिला गर्भवती दिख रही थी। गर्भ भी आखिरी स्टेज में था, मतलब 8 या 9 महीने का गर्भ रहा होगा। मैंने चौकीदार से कहा कि वह मुझे उस महिला के घर लेकर चलते। चौकीदार ने पहले तो मना किया लेकिन बाद में वे हम लोगों को उसके घर पहुंचाने के लिए राजी हो गया। होटल से 20 किलोमीटर दूर उसका घर था। हम बड़ी मुश्किल से वहां पहुंचे। महिला के घर में घुसे तो देखा कि वह दर्द से बेहाल हो रही थी। उसे हम लोगों को अपने घर में देखकर झटका-सा लगा। उसने चोकीदार से कहा कि वो कभी भी बच्चे को जन्म दे सकती है। वो हम लोगों को यहां बाद में लाता। मुझे वहां कि भाषा समझ में आती थी। मैंने उस महिला से कहा कि हमें सेक्स नहीं करना है। बस आप हमसे कुछ पल के लिए बात कर लो। वो महिला मान गई। मैंने कहा कि आप क्यों अपने जिस्म को बेचती हैं। उस महिला का जवाब बड़ा कड़वा था। उसने कहा कि जनाब, यहां सब जिस्म को रौंदने वाले आते हैं। पहली बार किसे ने वो सवाल पूछा है जिसका जवाब मेरे पास भी नहीं हैं। उस महिला ने कहा कि आप यहां अपनी हवस की भूख मिटाने आए हो, जो करना है अन्दर चलो और करो। मैंने पूछा कि क्या कीमत लोगी। उसने कहा- सिर्फ 10 रुपए। मैंने कहा- मुझसे आधा घंटा बात कर लोग, 500 रुपए दूंगा। वह बोली- मैं भिखारी नहीं हूं। मैंने कहा कि जो तुम कराती हो वो तो भिखारी से भी गन्दा काम है। उसने कहा कि मैं आपके हर सवाल का जवाब दूंगी लेकिन पैसे नहीं लूंगी। पता नहीं क्यों, मुझसे रहा नहीं गया। मैंने उसे बता दिया कि हम लोग यहां एक मिशन पर आए हैं और टारगेट सिर्फ आप हो। मैं आपकी जिंदगी के बारे सब कुछ जानना चाहता हूं।
मैंने कैमरा पर्सन को कहा कि कैमरा आन रखे। उस महिला ने अपनी राम कहानी शुरू की, बोली- मेरी जब शादी हुई तब से 10 साल तक मेरा शारीरिक संबंध सिर्फ अपने पति से रहा। हम पहले भी गरीब थे आज भी गरीब हैं। गांव के ही एक स्कूल में स्वीपर की भरती होनी थी। मैंने सोचा कि क्यों न मैं यहां भरती हो जाऊं। मैं गांव के प्रधान के पास गई। मैंने कहा कि प्रधानजी, मुझे स्कूल में स्वीपर की नौकरी पर लगवा दीजिए। मुझे प्रधान से कुछ कागज भी लेने थे। प्रधान ने मुझे कहा कि सारा काम हो जाएगा, बस मेरी प्यास बुझा दो। प्रधान की मुझ पर पहले से ही गन्दी नजर थी। मैंने मना किया पर प्रधान जबरदस्ती करने पर उतारू हो गया। उसे बहुत रोका लेकिन उस दरिन्दे ने मेरी एक न सुनी। इसके बाद मुझे नौकरी के लिए पंचायत सेक्रेटरी के पास जाना था क्योंकि प्रमाणपत्र पर उनका साइन होना था। प्रधान ने उसे सब कुछ बता दिया था। उसने भी वही मांग की जो प्रधान ने की थी। कई शिकारी मुझ पर हमला बोल चुके थे लेकिन नौकरी मिलना अभी तक सपना था। वो समय भी आया जब इंटरव्यू था। इंटरव्यू लेने एसडीएम आईं थीं। साथ में उनका सहायक भी था। उसे भी प्रधान ने सब कुछ बता दिया था। एक बार सोचा कि शायद नौकरी लग जाए तो सब कुछ भूल जाउंगी लेकिन यहां भी मुझसे एसडीएम के सहायक ने कई रात उसी होटल में सेक्स किया। फिर भी मुझे नौकरी नही मिली। एक नौकरी के लिए मैंने सब कुछ लुटा दिया लेकिन नौकरी तो नहीं मिली। हां, जिस्म की मंडी में नौकरी जरूर मिल गई। अब हर रोज बिकती हूं, सिर्फ 10 रुपए में।
इतना सब कहकर वो महिला रोने लगी। इस महिला की एक 17 साल की बेटी भी है जो अपनी मां की ही तरह सुंदर है। वह 11वीं में पढ़ रही है। बेटा दूर कहीं हास्टल में रहकर पढ़ता है। बेटी गांव में सबसे शरीफ मानी जाती है लेकिन गांव वालो ने उस लड़की का भी जीना हराम कर दिया है। महिला ने कहा कि आज गांव की महिलाएं हमसे बात नहीं करती लेकिन रात के वक्त कई मर्द मेरे मेरे साथ मुंह काला करने के लिए आ जाते हैं।
महिला की बातें सुनकर मैं परेशान हो गया। मन ही मन ठान लिया कि इस महिला को अपने चैनल के माध्यम से इंसाफ दिलाउंगा। मैंने अपने न्यूज चैनल को स्टिंग आपरेशन का सारा वीडियो भेज दिया। यह खबर जब प्रसारित हुई तो कई दिनों तक सुर्खियों में रही। चैनल ने न सिर्फ टीआरपी बटोरा बल्कि पैसा भी खूब कमाया। पर उस महिला के हिस्से आया सिर्फ बदनामी। मेरा यह कैसा मिशन था! जिस देश में एक महिला प्रधानमंत्री की कुर्सी को लात मार देती है, जिस देश में राष्टपति पद पर एक महिला विराजमान हो, उसी देश में एक महिला सिर्फ 10 रुपये के लिए जिस्म बेचने को मजबूर है। न्यूज चैनल पर खबर चलने के बाद उस महिला का दर्द सभी तक पहुंचा होगा। सत्ता तक, एनजीओ तक, संगठनों तक। लेकिन महिला को सिवाय बदनामी हाथ आने के, कुछ नहीं मिला। मुझे अफसोस है कि मैंने उस महिला का स्टिंग आपरेशन कर अपने चैनल को क्यों भेजा जब चैनल में इतना दम नहीं था कि वो महिला को न्याय दिला सके। मुझे अब महसूस होता है कि मीडिया किसी मिशन पर नहीं है। उसे सिर्फ ऐसी खबरें चाहिए जिससे उसे टीआरपी मिले और पैसा मिले। आखिर कब मिशन की पगडंडी पर फिर चलेगा मीडिया का पहिया?
लेखक संजीव शर्मा पत्रकार हैं। mediasanjeev@gmail.com