आपका मंच

मीडिया को अपना मजहब समझने वाले सभी मीडियाकर्मी का पेन तह दिल से स्वागत करता है , हमे उम्मीद और विश्वास नहीं बल्कि पूरा यकीन है आगे भी हमे आपका सहयोग मिलता रहेगा

नेशनल पत्रिका पेन के आगाज़ के बाद जितना हमे आपका सहयोग मिला वो उम्मीद से भी कुई गुणा ज्यादा था ....इस सहयोग के लिए हम आपके हमेशा अभारी थे और रहेंगे भी ...... आपके बिना हमारा ये सफर अधुरा है .....

इस आधुनिक युग में अब पेन आपके बीच एक नये अवतार में है .... वेब की दुनिया में हमारा ये पहला कदम भले हो लेकिन हम आपको भरोसा दिलाते है कि पत्रकारिता की गरिमा को ..... कायम रखते हुये वक्त जैसा भी हम अपने आपको साबित करके दिखायेंगे

पेन वेब का आगाज़ करने के पीछे हमारा साफ-सुथरा मकसद सभी मीडियाकर्मी को एक सुत्र मे बांधना है, हम यहां पर एक ऐसा मंच देने की कोशिश कर रहे जहां इस गूंगे-बहरे समाज के हक की लड़ाई लड़ने के लिए हमेशा एक कदम आगे रहने वाला पत्रकार अपना दर्द अपने शब्दो में बयान करके अपने मन का हल्का कर सके

जो भी आपके दिल और दिमाग में हो उसे एक झटके में बयान कर दे यहां सब आपके दोस्त है और फिर इस बात से हम कैसे इंकार कर सकते है कि सच्चा दोस्त वही होता है जो अपने दुख-दर्द को दोस्ता के बीच बांटता है हम आपके दुख दर्द को बांटना चाहते है , क्या एक दोस्त होने के नाते हमारा आप पर इतना भी अधिकार नहीं है ?

कहते है किसी भी अच्छी पहले की शुरूआत इंसान को खुद से करनी चाहिए तो यहां ये कहते हुए पैन को खुशी हो रही है कि पेन के सबसे मजबुत कडी संजीव शर्मा ने ये पहल खुद से की है

हमारी वेब में आपका मंच नाम का संस्कृण है जहां संजीव शर्मा की आपबिती दर्ज है , तो आप क्या सोच रहे हो उठा लीजिए अपनी कलम लिख डालिए जो भी दिल में है उसे बयान कर दे

                                                                                     

                                                                           पेन परिवार को अच्छा लगेगा


 

 

खबर की कीमत और पत्रकारिता का स्‍याह पन्‍ना

 : एक पत्रकार का दर्द : इसके लिये वो महिला को नग्न करता था : बदमाश मुझ पर भूखे भेडि़यों की तरह टूट पड़े : इस बार मुझसे इस्तीफा ले लिया गया : मीडिया जब भी अपना मुंह खोलता है या अपनी कलम से बोलता है तो अपने लिए नहीं बल्कि इस गूंगे-बहरे समाज के लिए. एक मीडियाकर्मी के लिए ख़बर की चाहत जुनून के किस हद तक होती है, इस सवाल का जवाब पत्रकार बंधु अच्छी तरह जानते हैं. समाज का दर्द हम देख नहीं सकते और अपने दर्द में कभी उफ तक करना हमें मंजूर नहीं होता. कुछ दर्द ऐसा भी होता है जो बदलते समय के साथ और गहरा होता जाता है. और कई बार यही दर्द जेहन से निकल कर कागज के पन्‍नों पर उतर आता है. और फिर पन्‍ना कभी कभी बहुत सीख दे जाता है. मैंने भी इन पन्‍नों से बहुत कुछ सीखा है. इन्‍हीं यादों का झरोखा आज मैं खोलने को मजबूर हुआ हूं.

ये बात कुछ साल पहले की है. मैं उस समय एक टीवी न्यूज़ एजेंसी में काम कर रहा था. मेरे लिये ये सौभाग्य की बात थी पूरे जिले में मै अकेला टीवी पत्रकार था, पर परेशान कर देने वाली बात ये थी, काफी हाथ-पांव मारने के बाद भी मेरे हाथ महीने में महज पांच-छह ख़बरे ही लग पाती थी। खबरों के लिए कई बार तो सैकडों किलोमीटर का सफर भी तय करना पडता था. लेकिन न कभी रास्ते छोटे हुए और ना ही मेरी हिम्मत कम हुई. ख़बर खोजने की चाहत में मैं हमेशा अपने कान और आंख खुली रखता, एक बार अचानक मेरे हाथ एक ऐसा कागज लगा जिसमे लिखा था हर समस्या का समाधान है हमारे पास, साथ ही ये भी कि वो तांत्रिक निःसंतान को मनचाहा बच्चा भी दे सकता है.
मैंने ये सारी जानकारी अपने न्यूज़ डेस्क तक पहुंचाई मुझे कहा गया ख़बर बना कर भेजो.मैंने तुरंत जाल बिछाया क्योंकि ये ख़बर मेरे लिये चुनौती भरी थी, एक जोड़े को मैने उस तांत्रिक के पास भेजा. उन लोगों ने संतान ना होने की बात तांत्रिक को बताई. तांत्रिक ने कहा बिल्‍कुल बच्चा हो जायेगा, बस रोज मेरे पास आना होग, क्‍योंकि थोड़ा इलाज करना पड़ेगा. एक बार मैं खुद भी उस तांत्रिक बाबा के पास पहुंचा क्योंकि मैं मामले का जायजा खुद लेना चाहता था. इस बार भी उसने वही बात कही. तांत्रिक के पास मेरे अलावा और कई महिलाएं भी आई हुई थी, जिनके साथ बाबा पर्दे के अन्दर क्या कुछ करता था, ये कहना यहां पर मेरे लिये आसान नहीं है.
दरअसल ये बाबा सभी महिलाओं को बोलता था उनके अन्दर कोई आत्मा घुस गयी है, जिसे वो निकाल सकता है. इसके लिये वो महिला को नग्न करता था, आगे क्या होता होगा ये समझने के लिये दिमाग पर ज्यादा जोर डालने की जरूरत नहीं है. मैंने ये बात भी अपने न्यूज़ डेस्क को बता दी अब बारी अपने मिशन को अंजाम तक पहुंचाने की थी. इस बार मै एक लड़की के साथ उस तांत्रिक के पास पहुंचा ही था कि वहां पहले से मौजूद कुछ बदमाश मुझ पर भूखे भेडि़यों की तरह टूट पड़े. दस लोगों के बीच में मैं अकेला था. जहां जहां उनका दिल किया वहां वहां वो अपनी ताकत की अजमाइश किए. मैं भी अपने सामर्थ्‍य के हिसाब से मुकाबला करता रहा.
किसी तरह बचकर मैंने वहां से डीएसपी को फोन किया, क्योंकि आगे उन सब का मुकाबला कर पाना संभव नहीं था, फिर एक पत्रकार होने के नाते इस तरह मारपीट करना मेरी नज़रों में न कल सही था और ना ही आज है. इस दौरान अपने बचाव में मैं जो कुछ मुझ से हो सका वो सब किया.जख्मी हालत में मैं तुरंत थाने पहुंचा मुझ पर हमला करने वाले भी भाग चुके थे. अभी थाने के अन्दर बैठे मुझे चंद मिनट भी नहीं हुये थे कि अचानक मोबाइल की घंटी बज उठी. ये कॉल मेरे एजेंसी के न्यूज़ डेस्क, नोयडा से थी. बात करने वाले वो अधिकारी थे जो कभी हमें ख़बरों के लिए जूझना सिखाते थे. महोदय ने मुझसे यह नहीं पूछा कि हालत कैसी है, क्या हुआ तुम्हारे साथ, बल्कि  सीधा फरमान सुनाओ दिया गया कि चुपचाप नोएडा पहुंचो.
पुलिस मुझे जख्मी हालत में अस्पताल ले गयी. वहां मेरा मेडिकल कराया गया. तभी वहां के डॉक्टर को पता चला कि मै पत्रकार हूं तो उन्‍होंने धीरे से कहा भाई साहब एक टीवी पत्रकार है संजीव शर्मा, उनकी ख़बरें बड़ी अच्छी होती हैं, मैं उन्‍हें जानता तो नहीं परंतु वो आपकी मदद कर सकते हैं. ये सुनने के बाद मैं रोने लगा. मैंने डॉक्‍टर को बताया कि मैं ही संजीव शर्मा हूं. फर्क सिर्फ इतना है कि खबर बनाने वाला आज खुद खबर बन गया है. डॉक्टर साहब ने कहा आप मेरे बेटे जैसे हो इसलिए एक सलाह देता हूँ, इस समाज की बुराइयों से लड़ना बड़ा कठिन है. ये सब आगे भी होता रहेगा लेकिन कभी हार मत मानना. एक बार पेज थ्री फिल्म जरूर देखना, आपको बहुत कुछ सीखने को मिलेगा. मैंने डॉक्टर को धन्‍यवाद कहा और बाहर निकला. डॉक्‍टर साहब की सीख आज भी मेरे अंदर जिंदा है और जिंदा रहेगी. एक पल मुझे लगा शहर की मीडिया और मीडियाकर्मी मेरा साथ देंगे. लेकिन यहां मैं गलत था, कोई मेरे साथ खड़ा नहीं हुआ. जिनसे मुझे सबसे ज्यादा उम्मीद थी उन्‍होंने ही सबसे पहले मेरा साथ इस मुश्किल घड़ी में छोड़ दिया. लेकिन मैंने हार नहीं मानी तांत्रिक और तांत्रिक के गुंड़ों के खिलाफ थाने में मामला दर्ज करवा दिया. हां, लेकिन एक पत्रकार होने की हैसियत से नहीं बल्कि एक आम नागरिक की हैसियत से.
अगले रोज मैं नोएडा रवाना हो गया. न्यूज़ एजेंसी ने मेरे इस बहादुरी के लिए पुरस्‍कार पहले से ही तैयार रखा हुआ था. मुझसे कहा गया आप कुछ समय के लिये रिपोर्टिंग नहीं करेंगे. मुझे ये समझ में नहीं आया आखिर कंपनी ने ये फैसला क्‍यों लिया है. फिर पता चला कि मुझ पर आरोप लगाया गया है कि मैंने तांत्रिक से दस हजार रूपये मांगे थे. मैंने न्‍यूज एजेंसी ज्‍वाइन करने के बाद प्रॉपटी खरीदी. इन आरोपो का जवाब मैंने कम्पनी को नहीं दिया. कारण साफ है जब उनके नज़रों में हम बेईमान हैं तो इमानदारी का सबूत देने की जरूरत क्या है. हां, मैंने पांच बिस्वा जमीन खरीदी, लेकिन ये पैसे मेरे उस पिता के थे, जो आर्मी में लम्बे समय से गुमशुदा है. ये पैसा मेरी माता जी को आसाम राईफल्स ने दिया था. और ये जमीन सिर्फ एक लाख चालीस हजार रूपये की थी,  न की करोड़ों की. क्या बीस साल की नौकरी में मेरे पिता ने इतने पैसे भी नहीं कमाये होंगे कि वो अपने बच्चो के लिए पांच बिस्‍वा जमीन खरीद सकें.
मैंने अपने बेगुनाही का जवाब नहीं दिया, लेकिन असलियत सामने आने के बाद खुद तांत्रिक ने पुलिस में लिखित बयान दिया कि गलती मेरी है. मुझे माफ कर दिया जाये, मैं शहर छोड कर चला जाउंगा. मेरा मकसद ही था उस तांत्रिक को शहर से बाहर करना ताकि अंधविश्‍वास में अंधी होकर फिर कोई महिला उस हैवान के हवस की शिकार न बनें. ये अलग बात है कि इस कामयाबी के बदले मेरी नौकरी और इज्जत दोनों दांव पर लग गयी. मेरी इमानदारी के दस्तावेज थाने में आज भी मौजूद है.
इधर, नोयडा से बहादुरी का खिताब लेकर मैं अपने घर वापस पहुंच चुका था. फिर कम्पनी से फोन आया, मुझसे एक बार फिर नोयडा में हाजिरी दर्ज करवाने के लिये कहा गया. इस बार मुझसे इस्तीफा ले लिया गया और कहा गया आपके खिलाफ काफी शिकायतें हैं. मेरे खिलाफ शहर के ही एक नेता ने कम्पलेंट की थी, जिसके साइबर कैफे में बीएफ चलती थी. उसके खिलाफ हुई जांच की सीआईडी की टीम में मैं भी शामिल था. वर्तमान में ये मामला न्यायालय में विचाराधीन है. कम्पनी ने मुझे नौकरी से निकाल दिया. मैं कई महीने बेरोजगार रहा. लेकिन हर काली रात के बाद जिस तरह नई सुबह होती है, उसी तरह मेरी जिंन्दगी में उजाला आया. मुझे दिल्ली के एक उभरते एनसीआर न्यूज चैनल में नौकरी मिल गयी. इस चैनल में भी मेरे खिलाफ काफी कंम्पलेंट गयी लेकिन मुझे चैनल की तरफ से कभी कुछ नहीं बोला गया, क्योंकि उन्हें मुझ पर और मेरे इमान पर भरोसा था.
मेरा उस न्यूज़ एजेंसी से आज सिर्फ चंद सवाल हैं-
1. क्या एक मिशन में फेल होने का मतलब नौकरी से हाथ धौना होता है ?
2. स्कूल में जाने वाला बच्चा भी फेल हो जाता है, इसका मतलब क्या वो गद्दार है ?
3. इंडिया क्रिकेट टीम भी हमेशा नहीं जीतती, इस हार को मैच फिक्सिंग कहा जाए ?
4. किसी की चंद झूठी लाइनें क्या हमारे कैरियर को खत्म कर सकती हैं?
5. दो साल का रिश्ता चैबीस घंटे में कैसे टूट सकता है ?
6. विश्वास नहीं था तो अपना पत्रकार क्यो बना दिया ?
7. क्या हम पत्रकार आप के लिए चवीइंगम हैं, चूसों और थूक डालो ?
एक रिपोर्टर से न्यूज़ रूम के डेस्क इंचार्ज और रिपोर्टर से एसआईटी हेड का रास्ता आसान नहीं होता. मैंने ये रास्ता तय किया और अपने आपको साबित भी किया. लेकिन अपने दस साल के छोटे से अनुभव में बहुत कुछ सीखा, जहां विश्वास है वहां सबकुछ है, जहां विश्वास नहीं वहां कुछ नही. अगर मैं तांत्रिक वाले मिशन में कामयाब नहीं हुआ तो इसके पीछे सबसे बड़ा कारण ये था कि मैंने ये जानकारी उस इंसान के साथ शेयर की जिन्‍हें बहुत कुछ मानता था. लेकिन वो मेरी बात को रोटी की तरह पचा नहीं सके और उन्होंने ये जानकारी तांत्रिक को दे दी. खैर हर मोड़ हर दिन हर लम्हां हमें कुछ सीखाता है और हमे सीखना भी चाहिए इसी का नाम है जिन्दगी लाइव.

आपकी राय

मीडिया के कुछ साथियो ने अपने ब्लॉग , वेबसाइट मैं खास जगह दी पेश है मीडिया की एक वेबसाइट पर मेरा लेख और मंथन करने वाले पत्रकारों के कमेंट्स और सुझाव

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Thursday, February 26, 2009
उस पत्रकार की वेदना को पढ़ मेरी आँखे नम हो गई


एक मीडिया वेबसाइट पर एक पत्रकार संजीव शर्मा की आपबीती पढ़ी...सच में संजीव के दर्द को पढ़ कर मेरी आँखे नम हो गयी .संजीव ने लिखा है की एक स्टिंग ओपरेशन को अंजाम देने का ,उन्हें जिंदगी भर मलाल रहेगा ।सच ही तो है, एक पत्रकार जब किसी को इन्साफ नहीं दिला पता है ,तो वो अपने आप को जिंदगी भर कोसता रहता है ॥मेरी नज़र में यदि संजीव जी जिस मकसद से स्टिंग ओपरेशन करने गए थे, यदि उसी रूप में उन्हें स्टोरी मिल जाती तो, वो एक साधारण सी स्टोरी या स्टिंग ओपरेशन बन कर रह जाती ।लेकिन जिस सच से संजीव जी का सामना हुआ ,वो सच तो दिल को हिला देनेवाला है ॥एक महिला जो प्रसव पीडा से गुजर रही हो और उसके बाद भी अपना शरीर बेचने के लिए तैयार हो...सुन कर कलेजा कॉप जाता है॥आखिर वो महिला अपने प्रति इतनी निर्मम कैसे हो सकती है ।क्या उसे जिंदगी में इतने जख्म मिले है की, उसे अब किसी चीज़ की परवाह नहीं .जब पूरी कहानी पढ़ी तो लगा की दोषी कौन है ,वे लोग जिन्होंने उस लाचार महिला का फायदा उठाया या फिर हम पत्रकार जो उसे इन्साफ नहीं दिला सके ।मै यहाँ संजीव शर्मा द्वारा मीडिया के वेबसाइट भड़ास ४ मीडिया पर लिखे गए उनकी लाचारी को भड़ास ४ मीडिया का क्रेडिट देते हुए कॉपी पेस्ट कर रहा हु, ताकि आप भी इस सच को पढ़ सके ।


पेश है संजीव शर्मा की आपबीती .सौजन्य - भड़ास ४ मीडिया .कॉम
मैं उस समय एक न्यूज चैनल में काम करता था। मेरी सबसे ज्यादा दिलचस्पी खोजी पत्रकारिता में थी। मुझे जानकारी मिली थी कि हिमाचल प्रदेश के एक जिला में सिर्फ 10 रुपए में जिस्म बिक रहा है। सुन के विश्वास होना आसान नहीं था लेकिन न जाने क्यों मैं इस सनसनीखेज खबर को अपने कैमरे में कैद करने के लिए बेचैन हो गया। मैंने सबसे पहले अपने चैनल को इसकी सूचना दी। मुझे पहले मना कर दिया गया क्योंकि स्टिंग ऑपरेशन चैनल दिखाना ही नहीं चाहता था।
मैंने अपने समाचार प्रमुख से भी बात की लेकिन उन्होंने भी रोक दिया। काफी मनाने के बाद मुझे स्टिंग करने के लिए कह दिया गया। मैं खुश था क्योंकि यह मौका अपने आपको साबित करने का था। मैं कैमरा पर्सन को लेकर उस इलाके में पहुंच गया। वो एरिया काफी खतरनाक था। हमारी एक गलती जान पर भारी पड़ सकती थी लेकिन न जाने क्यों कदम पीछे खीचने को मन नहीं कर रहा था। 100 किलोमीटर का लंबा सफर तय करके मैं वहां पहुंच गया था जहां मेरी मंजिल थी। हम वहां एक सरकारी अतिथि गृह में रुके। हमने अपने मिशन के बारे में किसी को कुछ नहीं बताया। अतिथि गृह के चौकीदार से मैंने पूछा कि क्या हमें एक रात के लिए कोई लड़की यहां मिल सकती है। चौकीदार ने उपर-नीचे घूरा और कहा कि मुझे आप लोग मीडिया वाले लगते हैं। कहीं कोई गड़बड़ तो नहीं होगी। चौकीदार को हमने यकीन दिला दिया कि हम मीडिया वाले नहीं है। चौकीदार ने बताया कि यहां एक महिला है जिसके साथ आप 10 रुपये में ही सेक्स कर सकते हैं। लेकिन उसके लिए पहले आपको मेरी जेब गर्म करनी होगी। मैंने तुरंत उसकी जेब में 100 रुपए दे दिए। दो-तीन दिन हम होटल में ही रुके रहे। एक दिन सुबह-सुबह चौकीदार हमारे कमरे में आया और कहा कि वो महिला बाहर खड़ी है, जिसकी आपको जरूरत है। मैंने कहा हमे पहले दूर से दिखाओ। मैंने दूर से जब उस महिला को देखा तो आंखें चकरा गई। उसकी उम्र करीब 30 साल थी और गजब की सुंदर थी। वह महिला गर्भवती दिख रही थी। गर्भ भी आखिरी स्टेज में था, मतलब 8 या 9 महीने का गर्भ रहा होगा। मैंने चौकीदार से कहा कि वह मुझे उस महिला के घर लेकर चलते। चौकीदार ने पहले तो मना किया लेकिन बाद में वे हम लोगों को उसके घर पहुंचाने के लिए राजी हो गया। होटल से 20 किलोमीटर दूर उसका घर था। हम बड़ी मुश्किल से वहां पहुंचे। महिला के घर में घुसे तो देखा कि वह दर्द से बेहाल हो रही थी। उसे हम लोगों को अपने घर में देखकर झटका-सा लगा। उसने चोकीदार से कहा कि वो कभी भी बच्चे को जन्म दे सकती है। वो हम लोगों को यहां बाद में लाता। मुझे वहां कि भाषा समझ में आती थी। मैंने उस महिला से कहा कि हमें सेक्स नहीं करना है। बस आप हमसे कुछ पल के लिए बात कर लो। वो महिला मान गई। मैंने कहा कि आप क्यों अपने जिस्म को बेचती हैं। उस महिला का जवाब बड़ा कड़वा था। उसने कहा कि जनाब, यहां सब जिस्म को रौंदने वाले आते हैं। पहली बार किसे ने वो सवाल पूछा है जिसका जवाब मेरे पास भी नहीं हैं। उस महिला ने कहा कि आप यहां अपनी हवस की भूख मिटाने आए हो, जो करना है अन्दर चलो और करो। मैंने पूछा कि क्या कीमत लोगी। उसने कहा- सिर्फ 10 रुपए। मैंने कहा- मुझसे आधा घंटा बात कर लोग, 500 रुपए दूंगा। वह बोली- मैं भिखारी नहीं हूं। मैंने कहा कि जो तुम कराती हो वो तो भिखारी से भी गन्दा काम है। उसने कहा कि मैं आपके हर सवाल का जवाब दूंगी लेकिन पैसे नहीं लूंगी। पता नहीं क्यों, मुझसे रहा नहीं गया। मैंने उसे बता दिया कि हम लोग यहां एक मिशन पर आए हैं और टारगेट सिर्फ आप हो। मैं आपकी जिंदगी के बारे सब कुछ जानना चाहता हूं।
मैंने कैमरा पर्सन को कहा कि कैमरा आन रखे। उस महिला ने अपनी राम कहानी शुरू की, बोली- मेरी जब शादी हुई तब से 10 साल तक मेरा शारीरिक संबंध सिर्फ अपने पति से रहा। हम पहले भी गरीब थे आज भी गरीब हैं। गांव के ही एक स्कूल में स्वीपर की भरती होनी थी। मैंने सोचा कि क्यों न मैं यहां भरती हो जाऊं। मैं गांव के प्रधान के पास गई। मैंने कहा कि प्रधानजी, मुझे स्कूल में स्वीपर की नौकरी पर लगवा दीजिए। मुझे प्रधान से कुछ कागज भी लेने थे। प्रधान ने मुझे कहा कि सारा काम हो जाएगा, बस मेरी प्यास बुझा दो। प्रधान की मुझ पर पहले से ही गन्दी नजर थी। मैंने मना किया पर प्रधान जबरदस्ती करने पर उतारू हो गया। उसे बहुत रोका लेकिन उस दरिन्दे ने मेरी एक न सुनी। इसके बाद मुझे नौकरी के लिए पंचायत सेक्रेटरी के पास जाना था क्योंकि प्रमाणपत्र पर उनका साइन होना था। प्रधान ने उसे सब कुछ बता दिया था। उसने भी वही मांग की जो प्रधान ने की थी। कई शिकारी मुझ पर हमला बोल चुके थे लेकिन नौकरी मिलना अभी तक सपना था। वो समय भी आया जब इंटरव्यू था। इंटरव्यू लेने एसडीएम आईं थीं। साथ में उनका सहायक भी था। उसे भी प्रधान ने सब कुछ बता दिया था। एक बार सोचा कि शायद नौकरी लग जाए तो सब कुछ भूल जाउंगी लेकिन यहां भी मुझसे एसडीएम के सहायक ने कई रात उसी होटल में सेक्स किया। फिर भी मुझे नौकरी नही मिली। एक नौकरी के लिए मैंने सब कुछ लुटा दिया लेकिन नौकरी तो नहीं मिली। हां, जिस्म की मंडी में नौकरी जरूर मिल गई। अब हर रोज बिकती हूं, सिर्फ 10 रुपए में।
इतना सब कहकर वो महिला रोने लगी। इस महिला की एक 17 साल की बेटी भी है जो अपनी मां की ही तरह सुंदर है। वह 11वीं में पढ़ रही है। बेटा दूर कहीं हास्टल में रहकर पढ़ता है। बेटी गांव में सबसे शरीफ मानी जाती है लेकिन गांव वालो ने उस लड़की का भी जीना हराम कर दिया है। महिला ने कहा कि आज गांव की महिलाएं हमसे बात नहीं करती लेकिन रात के वक्त कई मर्द मेरे मेरे साथ मुंह काला करने के लिए आ जाते हैं।
महिला की बातें सुनकर मैं परेशान हो गया। मन ही मन ठान लिया कि इस महिला को अपने चैनल के माध्यम से इंसाफ दिलाउंगा। मैंने अपने न्यूज चैनल को स्टिंग आपरेशन का सारा वीडियो भेज दिया। यह खबर जब प्रसारित हुई तो कई दिनों तक सुर्खियों में रही। चैनल ने न सिर्फ टीआरपी बटोरा बल्कि पैसा भी खूब कमाया। पर उस महिला के हिस्से आया सिर्फ बदनामी। मेरा यह कैसा मिशन था! जिस देश में एक महिला प्रधानमंत्री की कुर्सी को लात मार देती है, जिस देश में राष्टपति पद पर एक महिला विराजमान हो, उसी देश में एक महिला सिर्फ 10 रुपये के लिए जिस्म बेचने को मजबूर है। न्यूज चैनल पर खबर चलने के बाद उस महिला का दर्द सभी तक पहुंचा होगा। सत्ता तक, एनजीओ तक, संगठनों तक। लेकिन महिला को सिवाय बदनामी हाथ आने के, कुछ नहीं मिला। मुझे अफसोस है कि मैंने उस महिला का स्टिंग आपरेशन कर अपने चैनल को क्यों भेजा जब चैनल में इतना दम नहीं था कि वो महिला को न्याय दिला सके। मुझे अब महसूस होता है कि मीडिया किसी मिशन पर नहीं है। उसे सिर्फ ऐसी खबरें चाहिए जिससे उसे टीआरपी मिले और पैसा मिले। आखिर कब मिशन की पगडंडी पर फिर चलेगा मीडिया का पहिया?
लेखक संजीव शर्मा पत्रकार हैं। mediasanjeev@gmail.com

Posted by latikesh at 2:46 AM
5 comments:
अनिल कान्त : said...
मेरी भी आँखें नाम हो गयी .... जब न्यूज़ चैनल इन्साफ नहीं दिला सकते तो आम आदमी की क्या बिसात ....बहुत ही दर्द भरी दास्तान

February 26, 2009 3:26 AM
रंजना said...
nihshabd hun......

February 26, 2009 3:34 AM
अंशुमाली said...
वाकई दिल दहलाती है खबर।

February 26, 2009 3:44 AM
sanjeev said...
sharma ji meri wajah se aap k aankho main ashak aaye main es k liye shama chahoonga....
mujhe dukh es baat ka jab maine apne dukh ko byan kiya to saara media mere 7 roya or khushi ki ki saare media ki soch ab bhi ek hain kaash KHABRON KA KAROOBAR KARNE WALE BHI ese samajh sakte...
main aapko nahin jaanta lekin aapki wajah se duniya mujhe jaane lagiu hain aapka blog pada so raha nahin...
aapka
sanjeev sharma

February 27, 2009 11:02 PM
latikesh said...
संजीव जी
जब मैंने एक मीडिया वेबसाइट पर आप के दर्द को पढ़ा , तो मै अपने पोस्ट पर इसे प्रकाशित कर ज्यादा लोगो तक पहुचाने की कोशिश की है .,मुझे ख़ुशी ,है ,करीब ५० से भी ज्यादा लोगो ने आप के अनुभव को पढ़ा और ..उस पर अपने दुःख का इज़हार भी किया है ..संजीव जी , मै आप की सराहना करता हु की मीडिया मे जॉब के प्रेशर के वावजूद आप ने अपने अनुभव को बड़े ही बेबाकी से लिखा है ..आप के साहस की मै दाद देता हु.
आप सदा सुखी रहे , यही ईश्वर से कामना करता हु.
latikesh
मुंबई

March 1, 2009 1:02 AM
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भड़ास ४ मीडिया मीडिया वेबसाइट मैं जब मेरा दर्द पब्लिश हुआ तो कई साथियो ने मेल करके अपनी बात कुछ इस कदर रखी

bhadas ka lekh Inbox
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sajid khan to me
show details 2/25/09

hi sanjeev bhai.ap ka lekh pda bhadas par ,aacha lga aap ne aapne dil ki bhadas bhahar nikal di,kitne loog hoote hia jo yeh kaam kar paate hia,aap aaj kal kha hia?

sajid khan to me
show details 2/25/09

NEWS24  

yaar tum is taarif ke kabil hu,tum ne jo likha hia sach likha hia,media main reh kar bhi hum media waale logo k eliye kuch bhi nhia kar paa rahen,can i get ur no?
- Show quoted text -

शर्मा जी ........ Inbox
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Vikram Dutt to me
show details 2/25/09

दोस्त आपकी बाते मन को भा गई और मै लिखने बैठ गया ! आपने ठीक लिखा की आपकी रूह कांप जाती है जब मीडिया का सालीअसली चेहरा सामने आ जाता है ! मेरा नाम विक्रम दत्त है और मै पैदा इलेक्ट्रोनिक मीडिया में ही हुआ ! अफ़सोस कई ऐसी खबरे की जो दिल को दुखा जाती है ! असल में भाई साहब सुनील दत्त के साथ मिलकर कई बेहतरीन खबरे की लेकिन आज पीछे मुड़कर देखते है तो तकलीफ होती है ! जोधपुर का सट्टा बाज़ार हमारा स्ट्रिंग था ! जहां हवा की रफ्तार पर सट्टा लगता है और भी कई बाते है जो हमने दिखाई ! 14 माह का बच्चा जो शराबी बन गया ! ............................................ लिखने बैठे तो लिखते ही जाये बस !!! लेकिन आखिर में न्यूज चैनल की सच्चाई ये ही है, अफसोस परिवार पालने की जिम्मेवारी ने यहाँ जीने को मजबूर कर दिया !!!!!!!!!!!!
खैर आपकी मुलाकात अच्छी लगी, फिर बाते होंगी इसी उम्मीद के साथ ................................

badhi Inbox
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dinesh sahara to me, dinesh.sahara
show details 2/25/09

sanjeev ji .aap ki report bahut dardnak hone ke babjud media ka sach cahera ujagar karti hai jisme matlab ki yari samaj me aati hai dinesh shakya sahara samay 155.pacca talab etawah 9412182182



this was an heart touching story Inbox
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Atul Chaturvedi to me
show details 2/25/09

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मुझे उस स्टिंग का जिंदगी भर अफसोस रहेगा









this was an heart touching story, infact it feels very bad that our industries, just uses us for their benefit.



--
ATUL CHATURVEDI



ATUL CHATURVEDI
REPORTER
TIMES GROUP
"BANGALORE MIRROR"
09741196901, 09480465900, 09342003428
http://atulchaturvedi29.blogspot.com/


realy we should thing Inbox
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javed zakaria to me
show details 2/28/09

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Dear friend

I have read your story on Latikesh Sharma blog its touch to heart that we are only being use by all
I have also done a string operation in Akola in Akola there was a gang working for bogus handicap certificate i goan to them and meet them as a businessmen and said that i have to travel always so pl make my duplicate handicap certificate after two days he call me and ask for 5 thousand i gave him 1000/- and remaining after work he have done my work and he call me on mobile i said that i want to go to Mumbai pl take my ticketon that cirtificate for third AC he said ok after he call and said your ticket is ready come on train and collect the ticket and your pass and pay the amount when i reach on station my camera person was also on station and police officer were also on station when he cam to give me the ticket and document of medical certificate and Samaj Kalyan certificate of handicap i gave money to him and that time my camera was also on and them police arrested him after the went to that persons room i thing that now our duty has finished police got 70 thousand in that room and 26 government rubber stamps police have shown 7 thousand in there report after that they started to ask him that whom u have given the certificate and police have goan to all those person and collected a huge money of bribe now that police have also transfer and case is in court police have taken money and all duplicate handicap are traveling with concession in railway nothing more no official railway enquire was done at that time i thing we have done our job for police or for our country
Thanks

Javed Zakaria
Akola (news24)
9422860786




pratikriya Inbox
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Vivek Anand to me
show details 3/1/09

sanjeev ji kya aapko pata nahi ki hamari media ka karobaar kya hai?mai yah to nahi janati ki wo kaun sa channel tha par dost yaha har shakh par ullu baithe hai...kuchh apwad hai jo ND TV ke naam se jaane jate hai par dost yaha sab aisa hi hai. vivek anand (freelancae cameraman in star news)



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Arun Harsh to me
show details 3/2/09

vaaki aaj channel sirf or sirf TRP or PAISSA ke liye kaam krte hai smaj me jo drd hai usse unhe koi lena dena nhi un logo ki aatma mr chuki hai lekin aap jaise logo ke kaarn abhi bhi kuch visvaas baaki hai ki kbhi vkt aane pr kuch aahuti to jrur denge aap



hi Inbox
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ASHISH AGARWAL to me
show details 3/7/09

Mr. Sanjiv
Hi
This is Ashish Agarwal. I was in Cobrapost. I did many sting sories
but i agree with u it a shameful job on journalism

Now
I run a NGO NAME FRIENDS



Re: pratikriya Inbox
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Vivek Anand to me
show details 3/9/09

dear frnd,
sanjeev kya mai jaan sakta hu k aap kisnews channel mai hai.waise aap na batana chahe to koi baat nahi par u hi puchh baitha .do"t mind.dost waise mai freelancer cameraman hoo aur bhadas 4 media lagatar padata rahta hoon.aap sooch rahe honge k mujhe kya padi hai par dost mai b media k andaruni sach se jab {2002 mai} ru-ba-ru hua to badi taklif hui.....khair aapka jawab to usi din aa gaya tha par dost toda busy tha vivek anand


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Thankyou Re: Chat with shweta sharma Inbox
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shweta sharma to me
show details 5/4/09

Thanks for sending me mail. Sorry i m not online right now but as soon
possible i will get back to you.


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Posted by संजीव शर्मा on December 5, 2009 at 2:30am
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मुझे आज भी वो दिन अच्छी तरह याद है , मैं एक न्यूज़ एजेन्सी मैं काम करता था , मेरी प्यास ,भूख , नींद सब खबर ही थी , पुलिस वालो से मेरी शुरू से ही नहीं बनती थी , हाँ इंटेलिजेंस ब्यूरो के कुछ लोगो से दोस्ती थी , मुझे उनसे खबर मिली थी कि हिमाचल मैं कुछ महिला दलाल हिमाचली बालाओं को खरीदने आ रही है , यह खबर इंटेलिजेंस ब्यूरो को उनके उस खबरी ने दे थी , जो खुद उन महिलाओं के लिए कुछ दिन तक काम करता आ रहा था , उन महिलाओं ने उसे कुछ पैसे भी दिए थे मकसद था , हिमाचल प्रदेश कि उन कम उम्र कि लड़कियों को हुस्न के बाज़ार मैं उतारना जिन्होंने कभी सेक्स नहीं किया हो , वो महिला दलाल मुँह मांगे पैसे देने के लिए तेयार थी , मुझे आशिक अली नाम के इन्फोर्मेर ने साफ़ कहा - सर मैंने खुद उन महिलाओं से पैसे लिए है लेकिन अब मेरा ज़मीर जाग चूका है क्यूँ कि मैं खुद किसी का भाई हूँ और पिता भी - हो सकता है कि कल वो महिलाएं मेरी बेटी को भी इस पेशे मैं उतारे इस लिए सर मैं उन्हें सलाखों के अन्दर पहुँचाना चाहता हूँ ,

मुझे उस इन्फोर्मेर कि बात मैं दम नज़र आने लगा था यह सच हैं , मैंने अपने न्यूज़ डेस्क को इन्फोर्म कर दिया था, पहले न्यूज़ प्रोड्यूसर टाल मटोल करने लगे लेकिन मैं भी नहीं माना यहाँ तक कि मेरी बहस तक हुई मुझे कुछ नज़र नहीं आ रहा था , मैं किसी भी हालत मैं उन महिला दलालों को बेनकाब करना चाहता था , लेकिन आसान यह काम भी नहीं था , हार के मुझे न्यूज़ शूट के लिए इजाज़त मिल ही गयी मैंने सबसे पहले उन दलालों के फ़ोन नंबर का पता लगाया , एक दिन आशिक अली ने मेरी बात उन दलालों से यह कहकर करवाई कि मैं हिमाचल का सबसे बड़ा दलाल हूँ , पहले उन महिलाओं ने मुझ से ठीक तरिके से बात नहीं कि , लेकिन कुछ दिनों के बाद उनका फ़ोन आया और उन्होंने कहा कितना माल हैं तुम्हारे पास मुझे यह समझते हुआ देर नहीं लगी कि माल का मतलब क्या है ? मैंने कहा हर तरह का माल मौजूद है बस बोली लगाओ यहाँ आकर , उन्होंने कहा कि हम जल्द आएंगे यहाँ मेरी परेशानी बड़ते जा रही थी क्यूँकि अब लड़किया कहाँ से लाता और फिर वो हुआ जो मैं चाहता भी था , और नहीं भी ...........

मुझे एक दिन फिर दलालों का देहरादून से फ़ोन आया मुझ से कहा गया कि माल तैयार रखना घटिया माल नहीं चलेगा फ्रेश कि जरुरत है ,,,, ये बोल सुनकर मेरे खून में आग लग गयी , मन खुद को भी कोसता था कि क्या ? मैं इन महिलाओं को बेनकाब कर पाउँगा ?

एक दिन फिर फ़ोन आया इस बार दलाल मेरे शहर से सिर्फ चंद किलो मीटर कि दुरी पर थे ,

इस बार फिर वही बोल मुझे कहा गया एक दिन के अन्दर एक दर्ज़न लड़की कि जरुरत है , मेरे पास कोई भी विकल्प नहीं था , उधर दूसरी तरफ न्यूज़ एजेन्सी का डंडा उन्हें किसी भी कीमत पर खबर कि जरुरत थी फिर चैनल के लिए स्ट्रिंगर कि औकात क्या होती है यह मेरे स्ट्रिंगर भाई भी सही तरिके से जानते है खबर ने भेजने का मतलब था कि रिपोर्टर ने पैसे निगल लिए है , वैसे मेरे लिए यह खबर स्वाभिमान कि लडाई भी थी क्यूंकि कि मैं साबित करना चाहता था कि किस तरह एक स्ट्रिंगर अपने सर पर मौत का कफ़न बांधकर जंग में उतरता है यह जानने के बावजूद भी की कब उसे दूध मैं मक्खी कि तरह निकाल कर फेंका जायेगा , मेरे सामने एक ही विकल्प था उन नाबालिग़ मासूम लड़किओं को बचा सकूँ जो हुस्न कि मंडी मैं नीलाम होने को तैयार बेठे थी , मैंने उन दलालों के आने से पहले फैक्ट्री मैं काम करने वाली कई महिलाओं से बात कि और कहा क्या वो मेरा साथ देगी लेकिन किसी ने भी मुझे भरोसा नहीं दिलाया मुझे हैरानी इस बात कि थी जिन महिलाओं से मैं मदद मांगना चाहता था वो कह रही थी कि आप हमारे साथ कुछ भी करें हमे मंज़ूर है लेकिन हम पुलिस के पचडे में नहीं पड़ना चाहते ,

इधर दूसरी तरफ महिला दलाल भी आने वाली थी सवाल यह था में उनके सामने किन लडकियों को पेश करता क्यूंकि समाज सूधारने का बीडा तो यहाँ पर मैंने ही उठाया था , लेकिन किसी ने मेरे मदद नहीं कि सही तो यह भी में यहाँ मदद मांग जरुर रहा था लेकिन मदद का मोहताज़ बिल्कुल नहीं था, में अच्छी तरह जानता हूँ कि खुदा भी उसकी मदद करता है जो खुद कि मदद करता है थक हार कर में अपने घर पहुंचा में काफी परेशान था दूसरी तरफ डेस्क से फ़ोन पर फ़ोन मुझ से जब मेरे घरवालो ने परेशानी का कारण पूछा तो आँखों से अश्क झलक आए में घर में फ़ुट फ़ुट कर रोया क्यूँ कि में कुछ नहीं कर पा रहा था , वहीँ अपनी समस्या अपने डेस्क को नहीं बता सकता था क्यूँ कि उन्हें समस्या नहीं बल्कि समाधान चाहिए था ,

मेरी बहन कि उम्र उस समय १६ साल थी उसने मुझे कहा भईया में उन महिला दलालों को बेनकाब करवाउंगी एक बात को उसने बड़े जोर से कहा कि भईया मेरे नाटक करने से अगर वो दलाल आपके जाल में फंस जाते है तो कम से कम बाकी नाबालिग़ लडकियों कि जान तो बच जायेगी , कम से हम किसी को हुस्न कि मंडी में जाने से तो वो बच जायेगी मुझे अपनी बहन कि बात पहले बुरी लगी लेकिन उसकी बात में उन लड़कियों के लिया दर्द भी छिपा था जिन्हें हुस्न कि मंडी के दरिन्दे फांस कर ले जाते है और बेच देते है , मेरी बहन मुझ से छोटी है लेकिन उसकी बात मेरी सोच से भी ऊँची थी , मैंने उसकी बात मान ली एक बार फिर मुझे दलालों का फ़ोन आया और बोला कि हमे लेने एक चौक पर आ जाओ मैंने अपनी गाडी उठाई और निकल पड़ा मिशन पर दो नेपाल मूल की महिला दलाल बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी , हम तीन लोग उन महिलाओं के पास गए मेरे दो और दोस्त थे वो लोग भी फर्जी दलाल बने थे हम बड़े प्यार से उन महिलाओं को अपने घर ले गए वहाँ पर मैंने पहले से ही स्पाई केम लगा हुआ था मैंने अपनी बहन से उन दोनों दलालों को मिला भी दिया मेरे सामने उन दलालों ने मेरे बहन से वो सवाल पूछे जो में बयाँ नहीं कर सकता में अन्दर ही अन्दर रो रहा था हार कर मैं में उन महिला दलालों के बीच से उठ गया क्यूँ के में वो सवाल बर्दाश्त नहीं कर सकता था वो पूछ रही थी मेरे बहन से ..... मेरे सिस्टर ने ऐसा जाल बिछाया कि वो दलाल फंस चुकी थी उन्होंने एक एक कर के अपने राज़ खोले और कहा बड़े बड़े बिल्डर्स और बड़े बड़े बाबू और कई बार तो नेता भी हम से लड़की कि डिमांड करते है हिमाचल के लड़किओं कि ज्यादा डिमांड है लेकिन हमे १५ साल से १८ साल तक कि जरुरत है जिनके दाम सही मिल जाते है हमारे पास एडवांस बुकिंग रहती है है हम हर महिला को १००० रूपए हर दिन देते है और जिनके साथ भी वो एक रात जाएगी उसका ६०० रूपए हर आदमी से अलग से मिलेंगे यहाँ यह भी कहा गया कि अभी भी एक दर्ज़न से ज्यादा लड़किया हमारे पेशे में जुडी है यह सारी बातें हमारे कैमरे में रिकॉर्ड हो रही थी चार घंटे के इस शूट में हुस्न के मंडी के कई सनसनी खेज राज खुल चुके थे , हम तीनो फर्जी दलालों में से एक मेरा दोस्त पुलिस को सारी बात बताने चला गया ताकि उन महिलाओं कि गिरफ्तारी हो सकती ,,, इधर दलाल हमारे जाल में फंस चुकी थी और अब दलालों ने एडवांस पेमेंट दे दी थी और वो मेरी सिस्टर को लेकर अपने साथ हिमाचल से देहरादून ले कर जा रहे थे लेकिन तभी मेरे घर से सिर्फ एक किलोमीटर दूरी पर पुलिस ने आरोपी दलाल महिलाओं को हिरासत में ले लिया क्यूँ की रिपोर्टर होने के साथ मेरी यह फ़र्ज़ भी था हम चाहते तो सिर्फ खबर दिखाते लेकिन हमने उन दलाल महिलाओं को जेल पहुंचा दिया इस तरह हमने सच को सामने रखा मुझे कभी कभी लगता है अपनी बहन को इस्तेमाल नहीं करना था लेकिन यह सच है आज तक कई नाबालिग़ अगर हमारा मिशन पूरा नहीं होता तो दर्ज़नों लडकियां आज भी जिस्म के बाज़ार में लूट रही होती आज मेरे बहन की शादी हो चुकी है और एक बच्ची कि माँ भी है यह खुलासा हिमाचल पत्रकारिता के इतिहास का पहला स्टिंग ऑपरेशन था अगले दिन हर न्यूज़ पेपर की खबर मैं पहले पन्ने पर हम थे शायद ही किसी रिपोर्टर ने कभी अपने पेशे के लिए अपने परिवार को दाव पर लगाया हो हमने भी सिर्फ इस लिए अपने कदम पीछे नहीं किया क्यूँ की मेरा पेशा ही मेरा जूनून था .......... मैंने कई खुलासे किये लेकिन एक चैनल के लिए स्टिंगर USE AND THROUGH से ज्यादा कुछ नहीं मैं आज उस चैनल मैं नहीं हूँ ..... मुझे भी मक्खी की तरह दूध से निकल कर फेंक दिया गया ...... सिर्फ इस लिए क्यूँ की मैं एक मिशन मैं फ़ैल हो गया ...... लेकिन आज मैं ताल ठोक कर कह सकता हूँ .... मैं असल जिंदगी में पास हूँ और रहूँगा क्यूंकि बेईमानी ...चाटुकारिता ...चापलूसी ....मेरी खून मैं नहीं हैं और जिस दिन आएगी उस दिन मीडिया को अलविदा कहूँगा ....आज मैं एक अच्छे चैनल मैं हूँ और पोस्ट मैं भी खुद से ज्यादा मुझे आपने टीम पर भरोसा है ..... बस उस खुदा ये ही दुआ है ..... ऊंचाई तक पहुँचाना जरूर लेकिन ज़मीन से दूर भी ना करना जो कुछ मेरे साथ मेरे चैनल ने उस दौरान किया मैं कभी अपने स्टिंगर के साथ न ऐसा न कर सकूँ ....
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Comment by amar dev paswan on December 26, 2009 at 6:58pm
sanjiv ji ham ye kamna karte hai aapke is junun ke liye ki ram kary or or raastiy kary me aapka yu hi bhade aapka chaaw sath hi aap se jada aapki bahan ko sat sat koti naman karta hu ki wo aajki jhansi hai or aap kafi bhagysali hai ki bhagwan ne aapko aysi bahan di aapka --- amardev - News24 kolkata Comment by tee kay marwah on December 25, 2009 at 11:45am
आपकी हिम्मत काबिले तारीफ हे इसी तरह आगे बड़ते रहिए हिम्मते मरदे मददे खुदा रही चेन्नल से निकले जाने की तो वो नहीं निकलता तो अच्छी जगह कैसेमिलती Comment by ombeer singh on December 7, 2009 at 7:47pm
KALAM KE VEER AAPKO SALAM. Comment by abhas kumar on December 7, 2009 at 7:07pm
dost, apki himmat ko salam. Comment by Anil Mittal on December 6, 2009 at 8:22pm
संजीव जी नमस्कार ,,,,आपका पहला स्टिंग वाह जी वाह क्या कहना आपका ,,,,,,,,,,,आपने तो कमाल कर दिया ,,,,,,,,,,,,,आपसे ऐसी उम्मीद शायाद किसी को भे नहीं होगी ,,,,,,,मगर आपने कर दिया ,,अपने परिवार को भी दाव पर लगा दिया ,,,,,,,,आपके जज्बे को सलाम ,,,,,आपकी हिम्मत को सलाम ,,,,,,,,, Comment by krishna deo on December 6, 2009 at 3:53pm
आपके जज़्बे को सलाम दोस्त ! Comment by Rajendra Joshi on December 6, 2009 at 9:16am
Bahut khuub , Imandari aur dusron ki madad bahut santusti deti hai , Joo dusroon ko nahin mil sakti , Jo aatam saaman aapko mila hoga uski koi keemat nahin , Isliye Imandari ka rasta hi aage badhne ka rasta hai , Comment by Amit Kr. Singh Virat on December 5, 2009 at 8:36pm
thousands times salute ur daring work Comment by Amit Kr. Singh Virat on December 5, 2009 at 8:34pm
aap jaise log jab tak patrakarita mein raheinge tab tak hi log is peshe par bharosa kareinge warna.........aaj to patrakarita gaali lagti hai Comment by pankaj pachpol on December 5, 2009 at 4:26pm
bhaie aapko salute bahot bahot salut aapanke bahot hi aachha kam kiya hai lekin mera ek saval hai her reportor ke sath me chahe o news chaanel me ho ya printt media me uski saunthha usase aissa bartav kyu karti hai


i really proud on u Inbox
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vivek dubey to me
show details Jun 25

Respected Sir,

i read ur autobiography in media munch, Excellent Work, i really proud on u. media really need people like u


Thanks & Regards
Vivek Dubey
Transmission Officer
Zee 24 Ghante Chhattisgarh raipur

प्रस्तुतकर्ता संजीव शर्मा पर ८:३८ AM 0 टिप्पणियाँ

रविवार, २ मई २०१०

मुझे उस स्टिंग का जिन्दगी भर अफ़सोस रहेगा

मैं उस समय एक न्यूज चैनल में काम करता था। मेरी सबसे ज्यादा दिलचस्पी खोजी पत्रकारिता में थी। मुझे जानकारी मिली थी कि हिमाचल प्रदेश के एक जिला में सिर्फ 10 रुपए में जिस्म बिक रहा है। सुन के विश्वास होना आसान नहीं था लेकिन न जाने क्यों मैं इस सनसनीखेज खबर को अपने कैमरे में कैद करने के लिए बेचैन हो गया। मैंने सबसे पहले अपने चैनल को इसकी सूचना दी। मुझे पहले मना कर दिया गया क्योंकि स्टिंग ऑपरेशन चैनल दिखाना ही नहीं चाहता था।

मैंने अपने समाचार प्रमुख से भी बात की लेकिन उन्होंने भी रोक दिया। काफी मनाने के बाद मुझे स्टिंग करने के लिए कह दिया गया। मैं खुश था क्योंकि यह मौका अपने आपको साबित करने का था। मैं कैमरा पर्सन को लेकर उस इलाके में पहुंच गया। वो एरिया काफी खतरनाक था। हमारी एक गलती जान पर भारी पड़ सकती थी लेकिन न जाने क्यों कदम पीछे खीचने को मन नहीं कर रहा था। 100 किलोमीटर का लंबा सफर तय करके मैं वहां पहुंच गया था जहां मेरी मंजिल थी। हम वहां एक सरकारी अतिथि गृह में रुके। हमने अपने मिशन के बारे में किसी को कुछ नहीं बताया। अतिथि गृह के चौकीदार से मैंने पूछा कि क्या हमें एक रात के लिए कोई लड़की यहां मिल सकती है। चौकीदार ने उपर-नीचे घूरा और कहा कि मुझे आप लोग मीडिया वाले लगते हैं। कहीं कोई गड़बड़ तो नहीं होगी। चौकीदार को हमने यकीन दिला दिया कि हम मीडिया वाले नहीं है। चौकीदार ने बताया कि यहां एक महिला है जिसके साथ आप 10 रुपये में ही सेक्स कर सकते हैं। लेकिन उसके लिए पहले आपको मेरी जेब गर्म करनी होगी। मैंने तुरंत उसकी जेब में 100 रुपए दे दिए। दो-तीन दिन हम होटल में ही रुके रहे। एक दिन सुबह-सुबह चौकीदार हमारे कमरे में आया और कहा कि वो महिला बाहर खड़ी है, जिसकी आपको जरूरत है। मैंने कहा हमे पहले दूर से दिखाओ। मैंने दूर से जब उस महिला को देखा तो आंखें चकरा गई। उसकी उम्र करीब 30 साल थी और गजब की सुंदर थी। वह महिला गर्भवती दिख रही थी। गर्भ भी आखिरी स्टेज में था, मतलब 8 या 9 महीने का गर्भ रहा होगा। मैंने चौकीदार से कहा कि वह मुझे उस महिला के घर लेकर चलते। चौकीदार ने पहले तो मना किया लेकिन बाद में वे हम लोगों को उसके घर पहुंचाने के लिए राजी हो गया। होटल से 20 किलोमीटर दूर उसका घर था। हम बड़ी मुश्किल से वहां पहुंचे। महिला के घर में घुसे तो देखा कि वह दर्द से बेहाल हो रही थी। उसे हम लोगों को अपने घर में देखकर झटका-सा लगा। उसने चोकीदार से कहा कि वो कभी भी बच्चे को जन्म दे सकती है। वो हम लोगों को यहां बाद में लाता। मुझे वहां कि भाषा समझ में आती थी। मैंने उस महिला से कहा कि हमें सेक्स नहीं करना है। बस आप हमसे कुछ पल के लिए बात कर लो। वो महिला मान गई। मैंने कहा कि आप क्यों अपने जिस्म को बेचती हैं। उस महिला का जवाब बड़ा कड़वा था। उसने कहा कि जनाब, यहां सब जिस्म को रौंदने वाले आते हैं। पहली बार किसे ने वो सवाल पूछा है जिसका जवाब मेरे पास भी नहीं हैं। उस महिला ने कहा कि आप यहां अपनी हवस की भूख मिटाने आए हो, जो करना है अन्दर चलो और करो। मैंने पूछा कि क्या कीमत लोगी। उसने कहा- सिर्फ 10 रुपए। मैंने कहा- मुझसे आधा घंटा बात कर लोग, 500 रुपए दूंगा। वह बोली- मैं भिखारी नहीं हूं। मैंने कहा कि जो तुम कराती हो वो तो भिखारी से भी गन्दा काम है। उसने कहा कि मैं आपके हर सवाल का जवाब दूंगी लेकिन पैसे नहीं लूंगी। पता नहीं क्यों, मुझसे रहा नहीं गया। मैंने उसे बता दिया कि हम लोग यहां एक मिशन पर आए हैं और टारगेट सिर्फ आप हो। मैं आपकी जिंदगी के बारे सब कुछ जानना चाहता हूं।

मैंने कैमरा पर्सन को कहा कि कैमरा आन रखे। उस महिला ने अपनी राम कहानी शुरू की, बोली- मेरी जब शादी हुई तब से 10 साल तक मेरा शारीरिक संबंध सिर्फ अपने पति से रहा। हम पहले भी गरीब थे आज भी गरीब हैं। गांव के ही एक स्कूल में स्वीपर की भरती होनी थी। मैंने सोचा कि क्यों न मैं यहां भरती हो जाऊं। मैं गांव के प्रधान के पास गई। मैंने कहा कि प्रधानजी, मुझे स्कूल में स्वीपर की नौकरी पर लगवा दीजिए। मुझे प्रधान से कुछ कागज भी लेने थे। प्रधान ने मुझे कहा कि सारा काम हो जाएगा, बस मेरी प्यास बुझा दो। प्रधान की मुझ पर पहले से ही गन्दी नजर थी। मैंने मना किया पर प्रधान जबरदस्ती करने पर उतारू हो गया। उसे बहुत रोका लेकिन उस दरिन्दे ने मेरी एक न सुनी। इसके बाद मुझे नौकरी के लिए पंचायत सेक्रेटरी के पास जाना था क्योंकि प्रमाणपत्र पर उनका साइन होना था। प्रधान ने उसे सब कुछ बता दिया था। उसने भी वही मांग की जो प्रधान ने की थी। कई शिकारी मुझ पर हमला बोल चुके थे लेकिन नौकरी मिलना अभी तक सपना था। वो समय भी आया जब इंटरव्यू था। इंटरव्यू लेने एसडीएम आईं थीं। साथ में उनका सहायक भी था। उसे भी प्रधान ने सब कुछ बता दिया था। एक बार सोचा कि शायद नौकरी लग जाए तो सब कुछ भूल जाउंगी लेकिन यहां भी मुझसे एसडीएम के सहायक ने कई रात उसी होटल में सेक्स किया। फिर भी मुझे नौकरी नही मिली। एक नौकरी के लिए मैंने सब कुछ लुटा दिया लेकिन नौकरी तो नहीं मिली। हां, जिस्म की मंडी में नौकरी जरूर मिल गई। अब हर रोज बिकती हूं, सिर्फ 10 रुपए में।

इतना सब कहकर वो महिला रोने लगी। इस महिला की एक 17 साल की बेटी भी है जो अपनी मां की ही तरह सुंदर है। वह 11वीं में पढ़ रही है। बेटा दूर कहीं हास्टल में रहकर पढ़ता है। बेटी गांव में सबसे शरीफ मानी जाती है लेकिन गांव वालो ने उस लड़की का भी जीना हराम कर दिया है। महिला ने कहा कि आज गांव की महिलाएं हमसे बात नहीं करती लेकिन रात के वक्त कई मर्द मेरे मेरे साथ मुंह काला करने के लिए आ जाते हैं।

महिला की बातें सुनकर मैं परेशान हो गया। मन ही मन ठान लिया कि इस महिला को अपने चैनल के माध्यम से इंसाफ दिलाउंगा। मैंने अपने न्यूज चैनल को स्टिंग आपरेशन का सारा वीडियो भेज दिया। यह खबर जब प्रसारित हुई तो कई दिनों तक सुर्खियों में रही। चैनल ने न सिर्फ टीआरपी बटोरा बल्कि पैसा भी खूब कमाया। पर उस महिला के हिस्से आया सिर्फ बदनामी। मेरा यह कैसा मिशन था! जिस देश में एक महिला प्रधानमंत्री की कुर्सी को लात मार देती है, जिस देश में राष्टपति पद पर एक महिला विराजमान हो, उसी देश में एक महिला सिर्फ 10 रुपये के लिए जिस्म बेचने को मजबूर है। न्यूज चैनल पर खबर चलने के बाद उस महिला का दर्द सभी तक पहुंचा होगा। सत्ता तक, एनजीओ तक, संगठनों तक। लेकिन महिला को सिवाय बदनामी हाथ आने के, कुछ नहीं मिला। मुझे अफसोस है कि मैंने उस महिला का स्टिंग आपरेशन कर अपने चैनल को क्यों भेजा जब चैनल में इतना दम नहीं था कि वो महिला को न्याय दिला सके। मुझे अब महसूस होता है कि मीडिया किसी मिशन पर नहीं है। उसे सिर्फ ऐसी खबरें चाहिए जिससे उसे टीआरपी मिले और पैसा मिले। आखिर कब मिशन की पगडंडी पर फिर चलेगा मीडिया का पहिया?

पत्रकारिता के लिए परिवार को भी दाव पर लगा दिया

-संजीव शर्मा
मुझे आज भी वो दिन अच्छी तरह याद है, मैं एक न्यूज़ एजेन्सी मैं काम करता था। मेरी प्यास,भूख, नींद सब खबर ही थी। पुलिसवालों से मेरी शुरू से ही नहीं बनती थी। हाँ इंटेलिजेंस ब्यूरो के कुछ लोगो से दोस्ती थी। मुझे उनसे खबर मिली थी कि हिमाचल मैं कुछ महिला दलाल हिमाचली बालाओं को खरीदने आ रही है। यह खबर इंटेलिजेंस ब्यूरो को उनके उस खबरी ने दे थी, जो खुद उन महिलाओं के लिए कुछ दिन तक काम करता आ रहा था। उन महिलाओं ने उसे कुछ पैसे भी दिए थे मकसद था, हिमाचल प्रदेश की उन कम उम्र कि लड़कियों को हुस्न के बाज़ार मैं उतारना जिन्होंने कभी सेक्स नहीं किया हो, वो महिला दलाल मुँह मांगे पैसे देने के लिए तेयार थी। मुझे आशिक अली नाम के इन्फोर्मेर ने साफ़ कहा- सर मैंने खुद उन महिलाओं से पैसे लिए है लेकिन अब मेरा ज़मीर जाग चुका है क्योंकि मैं खुद किसी का भाई हूँ और पिता भी -हो सकता है कि कल वो महिलाएं मेरी बेटी को भी इस पेशे मैं उतारें इसलिए सर मैं उन्हें सलाखों के अन्दर पहुँचाना चाहता हूँ।
मुझे उस इन्फोर्मेर कि बात में दम नज़र आने लगा था यह सच है। मैंने अपने न्यूज़ डेस्क को इन्फोर्म कर दिया था। पहले न्यूज़ प्रोड्यूसर टाल मटोल करने लगे लेकिन मैं भी नहीं माना। यहाँ तक कि मेरी बहस तक हुई। मुझे कुछ नज़र नहीं आ रहा था। मैं किसी भी हालत में उन महिला दलालों को बेनकाब करना चाहता था। लेकिन आसान यह काम भी नहीं था। हार कर मुझे न्यूज़ शूट के लिए इजाज़त मिल ही गयी। मैंने सबसे पहले उन दलालों के फ़ोन नंबर का पता लगाया। एक दिन आशिक अली ने मेरी बात उन दलालों से यह कहकर करवाई कि मैं हिमाचल का सबसे बड़ा दलाल हूँ। पहले उन महिलाओं ने मुझ से ठीक तरीकेसे बात नहीं की, लेकिन कुछ दिनों के बाद उनका फ़ोन आया और उन्होंने कहा कितना माल है तुम्हारे पास? मुझे यह समझते हुआ देर नहीं लगी कि माल का मतलब क्या है? मैंने कहा हर तरह का माल मौजूद है बस बोली लगाओ यहाँ आकर। उन्होंने कहा कि हम जल्द आएंगे यहाँ मेरी परेशानी बड़ते जा रही थी क्योंकि अब लड़किया कहाँ से लाता और फिर वो हुआ जो मैं चाहता भी था, और नहीं भी।
मुझे एक दिन फिर दलालों का देहरादून से फ़ोन आया। मुझसे कहा गया कि माल तैयार रखना। घटिया माल नहीं चलेगा। फ्रेश की जरुरत है। ये सुनकर मेरे खून में आग लग गयी। मन मेंखुद को भी कोसता था कि क्या मैं इन महिलाओं को बेनकाब कर पाउँगा?
एक दिन फिर फ़ोन आया इस बार दलाल मेरे शहर से सिर्फ चंद किलोमीटर की दूरी पर थे।इस बार फिर वही बोल, मुझे कहा गया एक दिन के अन्दर एक दर्ज़न लड़कियोंकी जरुरत है। मेरे पास कोई भी विकल्प नहीं था। दूसरी तरफ न्यूज़ एजेन्सी का डंडा। उन्हें किसी भी कीमत पर खबर की जरुरत थी। फिर चैनल के लिए स्ट्रिंगर कि औकात क्या होती है? यह मेरे स्ट्रिंगर भाई भी सही तरीके से जानते हैं। खबर न भेजने का मतलब था कि रिपोर्टर ने पैसे निगल लिए हैं। वैसे मेरे लिए यह खबर स्वाभिमान कि लडाई भी थी। मैं साबित करना चाहता था कि किस तरह एक स्ट्रिंगर अपने स‌िर पर कफ़न बांधकर जंग में उतरता है। यह जानने के बावजूद कि कब उसे दूध मैं मक्खी कि तरह निकाल कर फेंका जायेगा। मेरे सामने एक ही विकल्प था, उन नाबालिग़ मासूम लड़कियों को बचा सकूँ,जिन्हेंहुस्न की मंडी मैं नीलाम करनेकीतैयारीहोरहीथी।मैंने उन दलालों के आने से पहले फैक्ट्री मैं काम करने वाली कई महिलाओं से बात की और कहा क्या वो मेरा साथ देंगी, लेकिन किसी ने भी मुझे भरोसा नहीं दिलाया। मुझे हैरानी इस बात की थी जिन महिलाओं से मैं मदद मांगना चाहता था वो कह रही थीं कि आप हमारे साथ कुछ भी करें हमे मंज़ूर है लेकिन हम पुलिस के पचडे में नहीं पड़ना चाहते।
दूसरी तरफ महिला दलाल भी आने वाली थी। सवाल यह था में उनके सामने किन लडकियों को पेश करता। समाज स‌ुधारने का बीडा तो यहाँ पर मैंने ही उठाया था। लेकिन किसी ने मेरे मदद नहीं की।मैंयहाँ मदद मांग जरूर रहा था लेकिन मदद का मोहताज़ बिल्कुल नहीं था। में अच्छी तरह जानता हूँ कि खुदा भी उसकी मदद करता है जो खुद की मदद करता है। थक हारकर मैं अपने घर पहुंचा। काफी परेशान था। दूसरी तरफ डेस्क से फ़ोन पर फ़ोन, मुझसे जब मेरे घरवालों ने परेशानी का कारण पूछा तो आँखों से अश्क झलक आए।मैं घर में फूट-फूट कर रोया क्योंकि मैं कुछ नहीं कर पा रहा था। अपनी समस्या डेस्क को नहीं बता सकता था क्योंकि उन्हें समस्या नहीं बल्कि समाधान चाहिए था।
मेरी बहन की उम्र उस समय 16 साल थी। उसने मुझे कहा भइया में उन महिला दलालों को बेनकाब करवाउंगी। एक बात को उसने बड़े जोर से कहा कि भइया मेरे नाटक करने से अगर वो दलाल आपके जाल में फंस जाते है तो कम से कम बाकी नाबालिग़ लड़कियों की जान तो बच जायेगी। कम से हम किसी को हुस्न की मंडी में जाने से तो वो बच जाएंगी। मुझे अपनी बहनकी बात पहले बुरी लगी लेकिन उसकी बात में उन लड़कियों के लिया दर्द भी छिपा था, जिन्हें हुस्न की मंडी के दरिन्दे फांसकर ले जाते है और बेच देते हैं। मेरी बहन मुझसे छोटी है लेकिन उसकी बात मेरी सोच से भी ऊँची थी। मैंने उसकी बात मान ली एक बार फिर मुझे दलालों का फ़ोन आया और बोला कि हमे लेने एक चौक पर आ जाओ मैंने अपनी गाडी उठाई और निकल पड़ा मिशन पर। दो नेपाल मूल की महिला दलाल बेसब्री से इंतज़ार कर रही थीं। हम तीन लोग उन महिलाओं के पास गए मेरे दो और दोस्त थे वो लोग भी फर्जी दलाल बने थे हम बड़े प्यार से उन महिलाओं को अपने घर ले गए। वहाँ पर मैंने पहले से ही स्पाई कैम लगा रखाथा। मैंने अपनी बहन से उन दोनों दलालों को मिला भी दिया। मेरे सामने उन दलालों ने मेरे बहन से वो सवाल पूछे जो में बयाँ नहीं कर सकता।मैं अन्दर ही अन्दर रो रहा था। हारकर मैं उन महिला दलालों के बीच से उठ गया।मैं वो सवाल बर्दाश्त नहीं कर सकता था। वो पूछ रही थी मेरी बहन से ..... मेरी सिस्टर ने ऐसा जाल बिछाया कि वो दलाल फंस चुकी थी।
उन्होंने एक-एक करके अपने राज़ खोले और कहा बड़े-बड़े बिल्डर्स और बड़े-बड़े बाबू और कई बार तो नेता भी हमसे लड़की की डिमांड करते हैं। हिमाचल की लड़कियोंकी ज्यादा डिमांड है। लेकिन हमे 15 साल से 18 साल तक की जरुरत है जिनके दाम सही मिल जाते हैं। हमारे पास एडवांस बुकिंग रहती है है। हम हर महिला को 1000रुपये हर दिन देते हैं। जिनके साथ भी वो एक रात जाएगी उसका ६०० रुपये हर आदमी से अलग से मिलेंगे। यहाँ यह भी कहा गया कि अभी भी एक दर्ज़न से ज्यादा लड़किया हमारे पेशे में जुडी हैं। यह सारी बातें हमारे कैमरे में रिकॉर्ड हो रही थीं। चार घंटे के इस शूट में हुस्न के मंडी के कई सनसनीखेज राज खुल चुके थे। हम तीनो फर्जी दलालों में से एक मेरा दोस्त पुलिस को सारी बात बताने चला गया ताकि उन महिलाओं की गिरफ्तारी हो सके। इधर दलाल हमारे जाल में फंस चुकी थी और अब दलालों ने एडवांस पेमेंट दे दी थी और वो मेरी सिस्टर को अपने साथ हिमाचल से देहरादून लेकर जा रहे थे, तभी मेरे घर से सिर्फ एक किलोमीटर दूरी पर पुलिस ने आरोपी दलाल महिलाओं को हिरासत में ले लिया। रिपोर्टर होने के साथ मेरा यह फ़र्ज़ भी था हम चाहते तो सिर्फ खबर दिखाते लेकिन हमने उन दलाल महिलाओं को जेल पहुंचा दिया।
इस तरह हमने सच को सामने रखा। मुझे कभी कभी लगता है किअपनी बहन का इस्तेमाल नहीं करना चाहिएथा। लेकिन यह सच है किअगर हमारा मिशन पूरा नहीं होता तो दर्ज़नों लडकियां आज भी जिस्म के बाज़ार में लुट रही होती। आज मेरी बहन की शादी हो चुकी है और एक बच्ची की माँ भी है। यह खुलासा हिमाचल पत्रकारिता के इतिहास का पहला स्टिंग ऑपरेशन था। अगले दिन हर न्यूज़पेपर की खबर में पहले पन्ने पर हम थे। शायद ही किसी रिपोर्टर ने कभी अपने पेशे के लिए अपने परिवार को दांव पर लगाया हो। हमने भी सिर्फ इसलिए अपना कदम पीछे नहीं किया क्योंकि मेरा पेशा ही मेरा जूनून था।
मैंने कई खुलासे किये लेकिन एक चैनल के लिए स्टिंगर USE AND THROUGH से ज्यादा कुछ नहीं। मैं आज उस चैनल मैं नहीं हूँ। मुझे भी मक्खी की तरह दूध से निकल कर फेंक दिया गया।सिर्फ इसलिए क्योंकिमैं एक मिशन मैं फेल हो गयाथा। लेकिन आज मैं ताल ठोंक कर कह सकता हूँ कि मैं असल जिंदगी में पास हूँ और रहूँगा। बेईमानी...चाटुकारिता...चापलूसी....मेरे खून मैं नहीं हैं। जिस दिन आएगी उस दिन मीडिया को अलविदा कहदूंगा। आज मैं एक अच्छे चैनल मैं हूँ। खुद से ज्यादा मुझे आपनी टीम पर भरोसा है। बस उस खुदा ये ही दुआ है किऊंचाई तक पहुँचाना जरूर, लेकिन ज़मीन से दूर भी ना करना। जो कुछ मेरे साथ मेरे चैनल ने उस दौरान किया, मैं कभी अपने स्टिंगर के साथ न ऐसा न कर सकूँ।

 

इन्हें सिर्फ सुरा-सुंदरी चाहिए

अपर्णा श्रीवास्तव

अपर्णा श्रीवास्तव

ईटीवी में कार्यरत रही एक महिला पत्रकार की दास्तान, उसी की जुबान से: मीडिया को जहां सम्‍मान व भरोसे के साथ देखा जाता था, सच के लिये लड़ते हुए और सच का साथ देने के लिये जाना जाता था, आज वही मीडिया अपने अंदर पनपती बुराई और बजबजाती गंदगी के कारण पैदा होने वाली संड़ाध के चलते जाना जाने लगा है. मीडिया में ऊंचे पदों पर बैठे हुए कुछ ऐसे दलाल हैं, जो राजनीतिक संरक्षण के बल पर अय्याशी करते हैं और अपने असली काम से गद्दारी करते हैं. आज कल बड़े-बड़े न्यूज चैनल्‍स अपने ही चैनल को तीन या चार साल की अवधि तक भाड़े पर या इनकी सभ्‍य भाषा में कह सकते हैं कि लीज पर या कांट्रैक्‍ट पर दे देते हैं.

 

इसके बाद अपना पल्‍ला झाड़ लेते हैं कि जब तक कांट्रैक्‍ट पर दिया है तब तक वहां क्‍या होता है, कौन क्‍या करता है, हमें उससे कोई मतलब नहीं. सिर्फ रुपये के अलावा. और तब ऐसे चैनल को कांट्रैक्‍ट बेस पर लेने वाले और चलाने वाले घूसखोर तथा चरित्रहीन व्‍यक्तियों के हाथ में इस मीडिया की चाभी, सत्‍ता आ जाती है. इसकी ताकत से ये आम इंसान को इंसान नहीं बल्कि अपने हाथों की कठपुतली समझने लगते हैं और हवस का शिकार बनाने के लिये नये नये मंसूबे रचने लगते हैं.

आइये जानें, वो कौन सा ऐसा न्‍यूज चैनल है जिसके नाम तो बड़े हैं पर अगर अंदर की बात आप जान जाओ तो दर्शन बहुत छोटे हैं. ये है ईटीवी न्‍यूज भोपाल, मध्‍य प्रदेश का. कहते हैं न्‍यूज चैनल देश की बुराइयों के चेहरे से नकाब उतारती है. पर अगर चैनल चलाने वाले ही ऐसे दलाल हों तब इनका चेहरा कौन दिखायेगा. पहले मैं खुद के बारे में बता दूं. मैं हूं अपर्णा श्रीवास्‍तव, जबलपुर से. आठ सितम्‍बर 2009 को बाकायदा इंटरव्यू पास करने के बाद मुझे होशंगाबाद जिले के लिये सलेक्‍ट किया गया था. सलेक्‍ट किया था सईद खान ने, लेकिन जब उनकी निजी ख्‍वाहिश, जो वो चाहते थे वो पूरी नहीं हुई तो उन्‍होंने और उनके चमचे अनुरुद्ध तिवारी ने मिलकर मेरी खबरों के साथ हेराफेरी करके मुझे परेशान करना शुरू किया. अलग अलग फोन नम्‍बरों से धमकी देकर मुझे डराना चाहा. सोचा कि अकेले औरत है, जो काम करने के लिये घर से बाहर रह रही है, ऐसे करके हम अपना काम निकाल सकते हैं, लेकिन जब वो जीत नहीं पाये तो ये कह कर इतनी दूर ट्रांसफर करवा दिया कि छह महीने के बाद भी काम नहीं आया, इसलिये तुम्‍हारा ट्रांसफर अन्‍नुपुर के लिये करवा दिया है.

अब आप एक बात बताइये,  जब इन्‍होंने इंटरव्यू लिया था तब इनको क्‍या पता नहीं था कि मैं फ्रेशर हूं, तब इन्‍हें अनुभवी लोगों को रखना चाहिए था तो क्‍यों इन्‍होंने फ्रेशर लोगों को रखा. जबकि इन छह महीनों में मैंने खुद कैमरा चलाना, न्‍यूज कवरेज करना सीखा. मेरा फोनो भी अक्‍सर होता रहता था, तो ये क्‍या काम नहीं है. शायद इन्‍हें सुरा और सुंदरी के अलावा और कोई काम नजर नहीं आता.

जब मैंने सईद खान से अपने लेट पेमेंट के लिये बात करने भोपाल जाती थी तो उनका ये कहना होता था कि तुम्‍‍हे पेमेंट की क्‍या जरूरत, तुम्‍हारे घर वाले तो पैसे वाले हैं. अब आप ही बताइये इसका मतलब तो उन्‍हें भी पेमेंट नहीं लेना चाहिए था फिर सईद खान पेमेंट क्‍यों लेता था! इस तरह की बातें सिर्फ सामने वाले को परेशान करने और अपना डर दिखाने के लिये की जाती थी. ऐसे हैं आजकल के गुरु जो अपने को गुरु बोलते हैं और वो भी तब ज‍ब आंखों का पानी तक सूख चुका हो. सईद खान और अनुरूद्ध तिवारी द्वारा बोले गये अश्‍लील बातों को मैं यहां लिखना नहीं चाहती.

बहरहाल मेरा ये कहना है अपने मान-सम्‍मान से बड़ी कोई चीज नहीं होती इसलिये मैने अपना ट्रांसफर नहीं स्‍वीकार किया और अपना इस्‍तीफा दे दिया. अब मैं अपनी महिला साथियों और आप सबसे पूछना चाहती हूं क्‍या ये है पत्रकारिता, ऐसा होता है मीडिया, जब मीडिया के ऐसे लोग ही इतने नीच हों तो ये क्‍या बाहर करते होंगे? इन लोगों के भीतर कितनी सच्‍चाई है? ये अपने आप को कितना बेच चुके हैं? ऐसे कई सवाल हैं. और अगर इसी को जर्नलिज्‍म कहते हैं तो इससे अच्‍छा है अपने आत्‍म सम्‍मान की रक्षा करना.

पिछले तीन सालों में ऐसे कई स्ट्रिंगर हैं जो इनसे परेशान होकर या तो नौकरी छोड़ देते हैं या ये उनका तबादला कहीं ऐसी जगह करवा देते हैं कि वो मजबूरी में छोड़ देते हैं. और तब ये अपने जैसे अपने चम्मचों को बकायदा 50000 घूस लेकर पोस्‍टेड करते हैं. जहां से इन्‍हें रुपयों की गड्डी मिल जाती है, वहां कोई मैनेजमेंट नहीं होता और जहां इनके स्‍वार्थ में कमी आ जाती है वहीं इनका ट्रांसफर और कड़ा मैनेजमेंट दिखता है.

अब देखिए ना, कहते हैं कि जो जिस जिले का होता है उसे वहां पर नहीं पोस्‍टेड कर सकते, तब होशंगाबाद जिला में शरद सिंह कैसे काम कर रहे हैं मेरी जगह पर, जबकि प्रॉपर वो होशंगाबाद का ही रहने वाला है, खुद का मकान है. फिर मुझे जबलपुर क्‍यों नहीं दिया गया था? क्‍योंकि मैंने 50000 नहीं दिये थे या उनके साथ लांग ड्राइव पर नहीं गई. होटल के कमरों में जाने से इनकार कर दिया.

इनके अनुसार अगर ट्रांसफर दो-तीन साल के अंदर होता है तो जगदीप सिंह बैस का ट्रांसफर क्‍यों नहीं हुआ. वो कैसे पांच साल से एक ही जगह भोपाल में जमे हुए हैं. इसलिये कि उनके सिर पर कांग्रेस अध्‍यक्ष सुरेश पचौरी का हाथ है. नव भारत के एक छोटे से पोस्‍ट पर मामूली तनख्‍वाह पर गुजर बसर करने वाले जगदीप सिंह बैस जो कि जबलपुर के ही रहने वाले हैं, अचानक कांग्रेस की राजनीति में कैसे आये और कैसे प्रदेश अध्‍यक्ष सुरेश पचौरी और कोषाध्‍यक्ष एनपी प्रजा‍पति के करीब आ गये. जहां से इनको राजनीतिक संरक्षण प्राप्‍त हुआ. पचौरी जी का हाथ सिर पर आया तो इनके तरक्‍की के रास्‍ते दिन ब दिन प्रतिदिन खुलते चले गये और फिर ईटीवी में आये और पांच साल से वहीं के होकर रह गये.

ये तो हम सभी जानते हैं कि किसी भी मीडियाकर्मी को, अगर वो जर्नलिस्‍ट है तो वो किसी भी राजनीतिक दल के लिये काम नहीं कर सकता. ये बॉण्‍ड ईटीवी में सबसे भरवाया जाता है. फिर कैसे जगदीप सिंह बैस ने 2009 में जबलपुर लोकसभा सीट से कांग्रेस से अपनी दावेदारी पेश कर दी. और तो और, अभी तक कांग्रेस के प्राथमिक सदस्‍य बने हुए हैं. ये तो पत्रकारिता के खिलाफ है कि एक ओर तो आप ईटीवी चैनल में हैं और दूसरी ओर आप नेता भी हैं कांग्रेस के. अब आप ही बताइये कि जो घपले-घोटाले करने वाले ईटीवी न्यूज चैनल में हैं इनको कौन सजा देगा. हम जैसे स्ट्रिंगरों को ईमानदारी से काम नहीं करने दिया जाता, अगर आप इनकी बात ना मानो और चापलूसी ना करो तो. और हम जैसे काम करने वालों को बेवजह सजा मिलती है और इनको क्‍यों कोई सजा नहीं देता, ये क्‍यों बच जाते हैं?

-अपर्णा श्रीवास्‍तव

Comments (34)Add Comment
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written by chhaliaya, August 07, 2010
अपर्णा जी.. पत्रकारिता के कोर्स में जो पढ़ाया जाता है... क्या उसका बीस फीसदी भी किसी मीडिया हाउस में इस्तेमाल होता है... क्या समाचार की सूरत से लेकर उसकी आत्मा तक को गढ़ने में टीवी चैनल उन नीतियों का पालन करते हैं... जो पत्रकारिता के पितामहों के आर्दश द्वारा स्थापित हुई हैं... मुझे इसका जवाब नहीं मिलता है... यही वजह है कि हम अपने अंदर विचारों की क्रांति का एहसास कर एक पत्रकार बनने तो निकल पड़ते हैं... लेकिन जिसे हम मंजिल समझते हैं... उसके दरवाजे पर दस्तक देने के साथ ही.. हमारे पांव एक ऐसे दलदल में चले जाते हैं... जिससे निकलना ज्यादातर लोगों के लिए मुश्किल और नामुमकिन हो जाता है... नतीजन या तो हम उसी दलदल का एक जोंक बनने की राह पर चल पड़ते हैं.. या फिर बाहर अवसाद और पीड़ा ग्रस्त होकर पीछे मुड़ जाते हैं... कई बार पूंजीवादी व्यवस्था हमें धकेलती है.. पीछे लौटने नहीं देती.. लेकिन जिसने कदम झटके से खींच लिए उन्हें अपना उत्साह बरकरार रहना चाहिए... ताकि जिस सोच के साथ अलग हुए.. उस सोच को फैलाना भी स्वत: उसका दायित्व बन जाता है... आप जिस सोच के साथ अलग हुई हैं.. उस सोच को आप जिंदा रखिए.. मुर्दा समाज को ऐसी संजीवनी की जरुरत है। 
और सबसे ज्यादा जरुरत उन्हें है जो... मुर्दा मठ के महंत बने हुए हैं.. और रोज कोट टाई पहनकर.. मेकअप लेकर... समाज की आवाज बुलंद करने के नाम पर घंटों प्रवचनकर्ता बाबाओ, से भी बड़े बड़े उपदेश देते रहते हैं.. आज उनके बीच की एक अबला ने जब खुल्लेआम अपने पर गंदी नीयत रखनेवालों को बेनकाब करने की हौसला दिखाया है.. तब सभी नपुंसक की तरह आवेगहीन बन गए हैं... इसी साइट पर फोटो के साथ अपने विचारों को प्रकाशित कराने वालों की उंगलियां खामोश क्यों हैं... ऐसा नहीं कि उनकी नजर इस आलेख पर नहीं पड़ी होगी.. लेकिन क्यों.. उन्होंने अपनी राय नहीं रखी... इससे तो यही संकेत मिल रहे हैं कि उनकी उंगलिया और कलम इस कदर गुलाम हो चुकी हैं... जो सिर्फ बिकने वाली बात ही लिख पाती हैं।
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written by Rahul, August 07, 2010
आदरणीय, 
ए़डिटर जी..... 

मैने इस मामले में अपने विचार दिए थे....जब आज देखा तो तीन लोगों ने मेरा दिया हुआ विचार ही कॉपी कर वैसे का वैसा लिख दिया......जो यह साबित करता है कि नकल करने वालों की कोई कमी नही....विचारों का समर्थन करना गलत नही....लेकिन किसी और के विचारों को शब्दश लिखना तो सरासर चोरी है....आपसे भी विनम्र अनुरोध है कृपया इस पर ध्यान दे.... 

मैने जो विचार लिखे थे वो इस प्रकार हैं.. 

वाकई आपके साहस की तारीफ करनी होगी...आपने जो कहा वो काफी हद तक सही है....प्रतिभा की कद्न नही है यहां....कोई एक नही कई चैनल्स में ऐसा है...फर्क ये है कि किसी की बात बाहर आ जाती है...और किसी की नही....दुख होता है.... हम एक सपना एक भविष्य की उम्मीद में इस क्षेत्र में कदम रखते हैं....और फिर इन छुपी कड़वी सच्चाई से वाकिफ होते हैं....जब कार्य़क्षेत्र व्यवसाय क्षेत्र बन जाए तो ...आपके हुनर की कोई अहमियत नही रह जाती....सही तरीका अपना के तो नही..... 
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written by pankaj kumar, August 07, 2010
Arpana is you r right. Ye jo media ka dusra rup hai woh kaphi gihnauna hai> inhe sura aur sundri ki jarurat hai, rahi kasar inke chamche pura karte hai. khut ko to kaam nahi karne aata hai to chamcha giri me lag jate hai. journalism ka kambal uhod kar media ko bechne ka kaam kiya hai. jab job nahi karna hai to in kutto ke against me juban kholna hi hoga.
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written by rajesh, August 07, 2010
...wahi hum to ese nhin hain.
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written by anees alam, August 07, 2010
SHAME........Shame...........shaaaaam
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written by sonia, August 07, 2010
mujhe lagta hai chahe media ho ya koe aur chetra agar burae hai to achache bhe. aaparna tumne jo sahas jutaya use tumhara bhadas kahe ya hatasha. artical pada aur tumhare takleef ka bhi aandaja hai. par sawal wahi ke tum kisi site mai to apni aapbete bata sakti ho jis par darjano logo ki pratikriyayein mil rahe hai, to tumne doshiyoin ke khilaf channel chodne se pehle prabandhan ya fir kyuin nahi diya. bus medan chod diya? muje lagta hai is purush pradhan samaj mai kuch bhi to aasan nahi hai pana. par jab dehlej lagh de aur lakshya nirdharit kar leye to apne ko khub majbut karo maintally aur kam mai bhi taki koe kami na nikal sake. chuky mai bhi media se huin pichle 15 sal se. par mera yakeen mano yadi aapko kam aata hai aur aap professoinal ho to koe kuch nahi bigad sakta.iseleye jo keh rahe hai partrakarita mahilaoin ke leye nahi vo khud nahi chahte ki mahilaoin ka dakal bade media mai. mere salah hai ke yadi media nahi chodna hai to jut jayo naye sire se patrakarita se. exclusive story ya freelancing kar bhi tum apne ruchi ko banaye rakh aapna nam aur aachacha kam pa sakti ho...all the best
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written by sanjay singh lko 9369827773, August 07, 2010
dost good hum to sochta hu hum reporters ki ki forse ka nirman hona chaie good my nu 09369827773 
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written by naresh bagri, August 07, 2010
Aparna ji ......you just look like kiran bedi.......very good lage raho...hum tum hare sath hai..... 
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written by naresh bagri, August 07, 2010
Aparna ji .........you just like a kiran bedi......very good...lage raho.......hum tum hare sath hai........... 
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written by sharad, August 07, 2010
वाकई आपके साहस की तारीफ करनी होगी...आपने जो कहा वो काफी हद तक सही है....प्रतिभा की कद्न नही है यहां....कोई एक नही कई चैनल्स में ऐसा है...फर्क ये है कि किसी की बात बाहर आ जाती है...और किसी की नही....दुख होता है.... हम एक सपना एक भविष्य की उम्मीद में इस क्षेत्र में कदम रखते हैं....और फिर इन छुपी कड़वी सच्चाई से वाकिफ होते हैं....जब कार्य़क्षेत्र व्यवसाय क्षेत्र बन जाए तो ...आपके हुनर की कोई अहमियत नही रह जाती....sharad 9414645764
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written by sharad, August 07, 2010
वाकई आपके साहस की तारीफ करनी होगी...आपने जो कहा वो काफी हद तक सही है....प्रतिभा की कद्न नही है यहां....कोई एक नही कई चैनल्स में ऐसा है...फर्क ये है कि किसी की बात बाहर आ जाती है...और किसी की नही....दुख होता है.... हम एक सपना एक भविष्य की उम्मीद में इस क्षेत्र में कदम रखते हैं....और फिर इन छुपी कड़वी सच्चाई से वाकिफ होते हैं....जब कार्य़क्षेत्र व्यवसाय क्षेत्र बन जाए तो ...आपके हुनर की कोई अहमियत नही रह जाती.... 
sharad pandya banswara rajastham 9414645764
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written by amitvirat, August 07, 2010
Aparna ji main khud 3 saal tak ETV ka Employee raha hoon. wahan par sirf dalalon ki chalti hai. Ramo ji rao khud bahut Bhrasht aadmi hai to uska channel aur uske channel ko chalne ke kaise log kaise honge yeh kahne ki zarurat nahin. hyderabad mein bhi UP, Bihar ke logon ko gulamon ki tarah rakha jata jai. kaam karne walon ke khilaf aawaaz udhane wale ko hi saza di jati hai. maine ETV sirf Isliye chhoda tha ki main wahan aazadi kaam nahin kar pa raha tha congress aur bjp ka naukar bana diya gaya hai. ab main patrika ke saath poori aazadi se kaam kar raha hoon yahan koi dabav nahin hai.
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written by sharma, August 07, 2010
Hame Garv hai ki aap jaisi Journalist bhi hain... Aap Case file kijiye... Aapko Sabhi ko benakab karna hoga... saza dilani hogi taki aur kahi aisa nahi ho sake..
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written by mamta, August 07, 2010
aparna ji 
apke sahas ki tarif kare bina mai nahi rah pai or ye bhi batana chahti hu ki aise gande mahol se print medi bhi bach nahi hai pichle kuch din pahle mahila patrkao ki stithi par 1 lekh par maine pratikriya di thi us par 1 sahab ko itna bura laga ki unhone kaha apki mansikta kharab hai aap mahila hone ka rone roti hai agar hum log mahila hone ka rona rote hai to fir aise or bhi kai log hai jo apne usulo se samjhota na karne karan success nahi hai kyo? is field me aane k bad niskarsh sirf ye hai ki bahar se ujli dikhne wali ye dunia andar se bahut hi bekar hai or is fiel ki vidambna ye hai ki isme aane ka bad aap kuch or karne layak bhi nahi rahte aparna ji hum apke sath hai
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written by RSChauhan, August 07, 2010
Hi, 
Ms. Arparna, If you may take some legal action against these people, it may be much better. These type of peoples are driving madia co. towards a deep ocean. 
Your efforts are really appreciable.Please procede for legal action in this regard. 
With best regards, 
RSChauhan, New Delhi 
rschauhan007@yahoo.com 
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written by mahandra singh rathore, August 07, 2010
aprana shrivastav ne jo kuch khaa hai agar woh thik hai too yeh e tv ke mangement ke lye sharm ke baat hai. media mai kya kya chlata hai yah media wale to jante hain per dusre log nahi.
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written by Manish Kumar, August 07, 2010
Weldon aparna, vaise to media ka kam dunia ke samne sachchai lane ka he, par ab lagta he ki use pehle apne andar ki sachchai ko dekhna chahia aur ye kam un seniors ko karna chahia jo corporate office me beth kar 4-4 saal ke contract banate he.
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written by भारत, August 07, 2010
मै आपकी बात से सहमत हूं
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written by sai sandeep shrivastava, August 07, 2010
Dear Journalist Aparna 
mai matra shakti ko naman karta hoo. sadav prathana karta hoo ki mere 
22 saal ke patrakarita career me maine aisi kitne new comer ko support 
kiya. aapka sankalp pura hoga samay ko koi nahi parajit kar paya. 
aap is field ko kadapi nahi chode. yadi uchit samjhe tho mujse sampark kariye. ( sandeep shrivastava Chhattishgarh) 
email id : sandipcorrespondent@rediff.com 
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written by pooja singh, August 06, 2010
aparna ji main bhi aapse bilkul sahmat hun,media ki dunia ka sach mujhe bhi jald hi pata chal gaya ki baher se ye dunia jitni chakachund bhari nazar aati hai darasal ander se isme utni hi sadhand hai.maine kabhi apne usoolon se samjhauta nahi kia isi lie mujhe kabhi iss field mein safalta nahi mili.ladkion ke lie to ye dunia bilkul nahi hai khaskar unke lie jo apne usoolon se samjauta nahi karti.ye mera anubhav hai ki maine iss field mein un mahilaon ko kabhi kamyab hote nahi dekha jo samjauta nahi karti......abhi ek sahab uper likhte hai ki acche log sabhi jagah hote hai yaha bhi hai par main unko bata dun ki vo acche log mahilaon ke lie nahi hai...............
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written by vikas jain, August 06, 2010
sirf ETV hi kyon... yahan to 90 % patrkar randibaj ho chuke hain.. rupyon ke bandal ke liy aapna eeman bech dete hain... our fhir bas nahin chlta.. nahin to ourat ke roop main apni raaten bech dete.. fhir yahaan to saiid khan patrkar nahin.. vo to jagdees katil ka kutta hai jo paisa kamane ke liy rajnetaon ki rakhel ho chuka hai .... smilies/cry.gif
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written by raj kumar, August 06, 2010
media me ghatiya logo ki kami nhi he....aap ne sach bol kar ek bar fir ye bata diya ki media field kitni bekar or ghatiya admiyo ki field he.....saeed or arun ko to nanga kar ke bich chorahe par lakar pitna chaiye.......aparna ji me aap ke sath hu.....
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written by Rahul, August 06, 2010
वाकई आपके साहस की तारीफ करनी होगी...आपने जो कहा वो काफी हद तक सही है....प्रतिभा की कद्न नही है यहां....कोई एक नही कई चैनल्स में ऐसा है...फर्क ये है कि किसी की बात बाहर आ जाती है...और किसी की नही....दुख होता है.... हम एक सपना एक भविष्य की उम्मीद में इस क्षेत्र में कदम रखते हैं....और फिर इन छुपी कड़वी सच्चाई से वाकिफ होते हैं....जब कार्य़क्षेत्र व्यवसाय क्षेत्र बन जाए तो ...आपके हुनर की कोई अहमियत नही रह जाती....सही तरीका अपना के तो नही.....
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written by chandan roy, August 06, 2010
media ke in dalalon ko goli mar deni chahiye....... 
saream.......
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written by etvian, August 06, 2010
this is the contemporary media
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written by arvind, August 06, 2010
aprna, 
media ki duniya bahar se jitani saaf aur imandar dikhati hai andar se ye utani hi bajbaja rahi hai lekin acche log har jagah hote hain hamen unhen pehcanane ki kabliyat hasil karni hogi.
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written by SHIVENDRA, August 06, 2010
ETV main jab se dallal saeed aur arun aa gaye hain inhe sirf paisa hi dikhta hai ye log sirf congresh aur bjp ke liye chanel ko girwi rakh diye hain sayeed ko kaam karne ke liye bolo to ek story nahi bana sakta lekin kanoon bata dabab banata hai weldon arpana. tumne saeed ki aukaat sabke samne la kar rakh hi di.
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written by rajesh srivastava, August 06, 2010
hi arpana 
tum bilkul sahi ho.ajkal media me yahi sab chal raha hai.print media me bhi yahi hal hai.ye problm kewal girls ke sath nahi but boys ke sath bhi hai.better to leave d media job 
i m reporter in hindustan delhi from last 8 years.
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